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Sunday, 27 May 2018

राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में राजनीतिक चेतना

  • राजस्थान में राजनीतिक चेतना का श्रीगणेश कर यहाँ की जनजातियों एवं किसानों ने इतिहास रच दिया। राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में भील, मीणा, गरासिया आदि जनजातियाँ प्राचीन काल से रहती आयी हैं।
  • अपने परम्परागत अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में इन्होंने अपना विरोध प्रकट किया, चाहे वह फिर अंग्रेजों के विरुद्ध हो या फिर देशी शासक के विरुद्ध।
  • यहाँ के किसानों ने भी अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों, शोषण एवं आर्थिक मार के विरोध में अपना विरोध जताकर राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती दे डाली।

Wednesday, 9 May 2018

राजस्थान के प्रमुख शहरों के उपनाम, पढ़ें


  • अन्न का कटोरा व राजस्थान का अन्न भण्डार - श्रीगंगानगर
  • अभ्रक की मण्डी - भीलवाड़ा
  • राजस्थान का ताजमहल - जसवंत थड़ा, जोधपुर
  • राजस्थान का जिब्राल्टर - तारागढ़, अजमेर
  • पूर्व का पेरिस - जयपुर

कालीबंगा


यह सभ्यता स्थल वर्तमान हनुमानगढ़ जिले में सरस्वती-दृषद्वती नदियों के तट पर बसा हुआ था, जो 2400-2250 ई. पू. की संस्कृति की उपस्थिति का प्रमाण है।
कालीबंगा में मुख्य रूप से नगर योजना के दो टीले प्राप्त हुये हैं।

Tuesday, 20 February 2018

मेवाड़ के राजवंश


गुहिलों का अभ्युदय


  • अबुल फजल मेवाड़ के गुहिलों को ईरान के बादशाह नौ शेरखां आदिल की सन्तान होना मानते है।
  • डी. आर. भण्डारकर मेवाड़ के गुहिलों को ब्राह्मण वंश से मानते है, क्योंकि बापा के लिए ‘विप्र’ शब्द आया है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा भी यह मानते है।
  • मुहणौत नैणसी इन्हें आदिरूप में ब्राह्मण एवं जानकारी से क्षत्रिय मानते है।
  • डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझाा, इन्हें ‘सूर्यवंशी’ मानते है।

Sunday, 18 February 2018

महाराणा प्रताप का राष्ट्रप्रेम और स्वामिभक्ति आज भी लोगों में प्रेरणा जागती है

महाराणा प्रताप (1572-97 ई.)

  • इनका जन्म विक्रम संवत 1597 (9 मई 1540 ई.) को कुम्भलगढ़ दुर्ग (कटारगढ़) के बादल महल में हुआ।
  • महाराणा प्रताप का जन्म वीर विनोद के अनुसार 15 मई 1539 ई. (मुहणोत नैनसी के अनुसार 4 मई 1540 ई.) को कुंभलगढ़ में हुआ था।
  • पिताः उदयसिंह
  • माताः जैवन्ता बाई (पाली नरेश अखैराज सोनगरा चौहान की पुत्री)
  • प्रताप का बचपन का नामः कीका
  • विवाह: 1557 ई. में अजब दे पंवार के साथ हुआ जिससे 16 मार्च 1559 ई. में अमरसिंह का जन्म हुआ।
  • उदयसिंह की होली के दिन 28 फरवरी 1572 ई. को गोगुन्दा में मृत्यु हो गई। यहां स्थित महादेव बावड़ी पर 28 फरवरी 1572 ई. को मेवाड़ के सामंतों एवं प्रजा ने प्रतापसिंह का महाराणा के रूप में राज तिलक किया।
  • उदयसिंह द्वारा नामित उत्तराधिकारी जगमाल को मेवाड़ के वरिष्ठ सामंतों ने अपदस्थ कर दिया।
  • उदयसिंह ने अपनी रानी भटयाणी के प्रभाव में आकर प्रताप की जगह जगमाल को उत्तराधिकारी बना गया।
  • सोनगरा अखैराज ने जगमाल को गद्दी से हटाकर प्रताप को गद्दी पर बैठाया, कृष्णदास ने प्रताप की कमर में राजकीय तलवार बांधी। 
  • 1570 ई. में अकबर का नागौर में दरबार लगा जिसमें मेवाड़ के अलावा अधिकतर राजपूतों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। 

  • अकबर ने महाराणा प्रताप के संबंध में 1572 ई. से 1576 ई. के बीच चार शिष्ट-मण्डल भेजे, परन्तु वे प्रताप को अधीन लाने में असफल रहे।
  • अ. पहली बार दरबारी जलाल खां जिसको नवंबर 1572 ई. में महाराणा प्रताप के पास भेजा, जो आत्मसमर्पण करवाने में असफल रहा।
  • ब. जून 1572 ई. में ही आमेर के राजकुमार मानसिंह को भेजा। दोनों की मुलाकात उदयसागर की पाल झील के पास हुई लेकिन वह भी राणा को अकबर की अधीनता स्वीकार करवाने में असफल रहा।
  • स. सितम्बर-अक्टूबर 1573 ई. में राजा भगवन्तदास को भेजा लेकिन वे भी असफल रहे।
  • द. दिसम्बर 1573 ई. में टोडरमल को भेजा लेकिन वह भी असफल रहा। अंत में अकबर ने युद्ध से महाराणा प्रताप को बंदी बनाने की योजना बनाई तथा मानसिंह को मुख्य सेनापति बनाकर भेजा।
  • ये चारों शिष्टमंडल प्रताप को समझाने में असफल रहे तो अकबर ने प्रताप को युद्ध में बंदी बनाने की योजना बनाई। 
  • बंदी बनाने की योजना अजमेर में स्थित किले में बनाई गई जिसमें आज संग्रहालय स्थित है तथा अंग्रेजों के समय का शस्त्रागार होने के कारण इसे मैगजीन भी कहते हैं।
  • अकबर ने मानसिंह को इस युद्ध का मुख्य सेनापति बनाया तथा मानसिंह का सहयोगी आसफ खान को नियुक्त किया गया।
  • मानसिंह 3 अप्रैल 1576 ई. को शाही सेना लेकर अजमेर से रवाना हुआ। उसने पहला पड़ाव मांडलगढ़ में डाला, 2 माह तक वहीं पर रहा उसके बाद वह आगे नाथद्वारा से लगे हुए खमनौर के मोलेला नामक गांव के पास अपना पड़ाव डाला। 
  • महाराणा प्रताप ने गोगुंदा और खमनौर की पहाड़ियों के मध्य स्थित हल्दीघाटी नामक तंग घाटी में अपना पड़ाव डाला।
  • हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ई. में हुआ। कर्नल टॉड ने इसे थार्मोपल्ली का युद्ध कहा है। इस युद्ध को इतिहासकार खमनौर व गोगुन्दा का युद्ध भी कहते है। 
  • राजपूतों ने मुगलों पर पहला आक्रमण इतना आक्रामक किया कि मुगल सैनिक चारों ओर जान बचाकर भागें। इस प्रथम चरण के युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एक मात्र मुस्लिम सरदार हकीम खां सूरी का नेतृत्व सफल रहा था।
  • पहले मुगल सेना हार रही थी परन्तु मुगल सेना के आरक्षित सेना के नेता मिहत्तर खां ने अकबर की आने की झूठी अफवाह फैला दी जिससे मुगलों के सैनिकों में जोश आ गया।
  • राजपूत भी पहले मोर्चें में सफल होने के बाद बनास नदी के किनारे वाले मैदान में जिसे ‘रक्तताल’ कहते हैं में आ जमें। 
  • इस युद्ध में राणा की ओर से पूणा व रामप्रसाद हाथी और मुगलों की ओर से गजमुक्ता व गजराज के मध्य युद्ध हुआ। रामप्रसाद हाथी के महावत के मारे जाने के कारण हाथी मुगलों के हाथ लग गया। इसका नाम अकबर ने पीरप्रसाद रखा।
  • मानसिंह मरदाना नामक हाथी पर सवार था।
  • मुगलों की शाही सेना ने प्रताप को चारों ओर से घेर लिया। बड़ी सादड़ी का झाला मन्ना सेना को चीरते हुए राणा के पास पहुंचा और महाराणा से निवेदन किया कि ‘आप राज चिह्न उतार कर मुझे दे दीजिए और आप इस समय युद्ध के मैदान से चले जाएं इसी में मेवाड़ की भलाई है।
  • चेतक की घायल होने की स्थिति को देखकर राणा ने वैसा ही किया। राजचिह्न के बदलते ही सैकड़ों तलवार झाला मन्ना पर टूट पड़ी। झाला मन्ना इन प्रहारों का भरपूर सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
  • महाराणा प्रताप का स्वामीभक्त घोड़ा चेतक बलीचा गांव में स्थित एक छोटा नाला पार करते हुए परलोक सिधार गया। इसी जगह ‘बलीचा गांव’ में चेतक की छतरी बनी हुई है।
  • ‘ओ नीला घोड़ा रा असवार’ शब्द राणा ने सुनें। प्रताप ने सिर उठाकर देखा तो सामने उसके भाई शक्तिसिंह को पाया। शक्तिसिंह ने अपनी करनी पर लज्जित होकर बड़े भाई के चरण पकड़ कर क्षमा याचना की, महाराणा प्रताप ने उन्हें गले लगाया और क्षमा कर दिया। इसकी जानकारी ‘अमरकाव्य वंशावली ग्रंथ व राजप्रशस्ति’ से मिलती है। जिसकी रचना संस्कृत भाषा में रणछोड़ भट्ट नामक विद्वान ने की।
  • फरवरी 1577 ई. में स्वयं अकबर और अक्टूबर 1577 ई. से लेकर नवम्बर 1579 ई. तक शाहबाज खान का तीन बार लगातार मेवाड़ अभियान करना अकबर का अपना उद्देश्य पूरा करने के प्रयास थे, वे भी असफल रहे। 
  • महाराणा प्रताप कोल्यारी गांव कमलनाथ पर्वत के निकट ‘आवरगढ़’ में अपनी अस्थायी राजधानी स्थापित करना एक विजेता का होना सिद्ध करना है।
  • 1580 ई. में अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना को प्रताप के विरूद्ध युद्ध करने भेजा। अब्दुल रहीम के साथ उसका परिवार भी आया जिसे उसने शेरपुर में छोड़ा। अमरसिंह ने मौका पाकर शेरपुर पर आक्रमण कर अब्दुल रहीम खानखाना के परिवार को बंदी बना लिया। महाराणा इससे नाराज हुए और उन्होंने अमरसिंह को अब्दुल रहीम के परिवार को सम्मानपूर्वक वापस छोड़कर आने को कहा। 
  • मुगल सम्राट अकबर ने 5 दिसम्बर, 1584 ई. को आमेर के भारमल के छोटे पुत्र जगन्नाथ कछवाहा को प्रताप के विरुद्ध भेजा। वह भी सफलता नहीं पा सका अपितु उसकी मांडलगढ़ में मृत्यु हो गई। 
  • प्रताप ने 1585 ई. के लगभग मेवाड़ के पश्चिमी-दक्षिणी भाग जोकि छप्पन के नाम से प्रसिद्ध था, के लूणा चावण्डियां को पराजित कर चावंड को अपनी आपातकालीन राजधानी बनाया। चावंड 1585 ई. से अगले 28 वर्षों तक मेवाड़ की राजधानी रही। यहीं पर महाराणा प्रताप ने चामुंडा माता का मंदिर बनवाया।
  • धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते हुए महाराणा प्रताप के चोट लगी, जिसके कारण 19 जनवरी, 1597 ई. को उनकी ‘चावंड’ में मृत्यु हो गई।
  • चावंड से 11 मील दूर बांडोली गांव के निकट बहने वाले नाले के तट पर महाराणा का दाह संस्कार किया गया। 
  • खेजड़ बांध के किनारे 8 खंभों की छतरी आज भी हमें उस महान योद्धा की याद दिलाती है।
  • प्रताप की मृत्यु का समाचार अकबर के कानों तक पहुंचा तो उसे भी बड़ा दुख हुआ। इस स्थिति का वर्णन अकबर के दरबार में उपस्थित दुरसा आढा ने इस प्रकार किया, 

‘अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी गहलोत 
राण जीती गयो दसण मूंद रसणा उसी, 
नीसास मूक मरिया नयण तो मृत शाह प्रतापसी’

  • इसका तात्पर्य था कि राणा प्रताप तेरी मृत्यु पर बादशाह ने दांत में जीभ दबाई और निःश्वास से आंसू टपकाए क्योंकि तूने अपने घोड़े को नहीं दगवाया और अपनी पगड़ी को किसी के सामने नहीं झुकाया वास्तव में तू सब तरह से जीत गया।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी को मेवाड की थर्मोपल्ली और दिवेर को ‘मेवाड़ का मैराथन’ कहा है।



Thursday, 8 February 2018

मांडना चित्रण


  • मरवन मंडे मांडना निरखे चतुर सुजान
  • राजस्थानी लोक अलंकरण का सबसे विकसित और प्रचलित रूप है मांडना। मांडना का अर्थ है चित्रित करना अथवा बनाना।
  • वे समस्त आकृतियां जो दीवार अथवा जमीन पर खड़िया, गेरू, हिरमच, पेवड़ी, काजल एवं अन्य देशी रंगों के माध्यम से बनाई जाती हैं, मांडना कहलाती है। ये आकृतियां हाथ की अगुलियों अथवा कूंची से बनाई जाती है। रेखाएं, रंग-टीकियां (टपकियां) और गांठे इसके चित्रण के प्रमुख माध्यम होते हैं।
  • होली, दीवाली, दशहरा अथवा अन्य त्योहारों पर जब समस्त घरों की लीपा-पोती और सजावट की जाती है तब यहां की महिलाएं देहरी, आंगन, दीवार या आलों में मांडना की सुन्दर आकृतियां बनाती हैं। ये मांडने विविध रंगों और अलंकृत रूपों में शोभित होते हैं।
  • राजस्थानी लोक मानस की सहज झलक हमें इन मांडनों में देखने को मिलती है।
  • घरों की सुन्दरता में चार चांद लगाने वाले ये मांडने शुभ-शकुन के प्रतीक भी माने जाते हैं। इनमें गृहस्थ जीवन के सुख और समृद्धि की मंगलकारी भावना अन्तनिर्हित होती है।

  • मांडना बनाने की कला यहां की कुमारियों को अपने घर की चतुर एंव अधेड़ महिलाओं से विरासत में मिलती रहती है। इसके लिए कन्याओं या नारियों को किसी विद्यालय में शिक्षा पाने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि घर में ही इनका चित्रण सीखकर वे अपने-अपने ढंग से इनको चित्रित करती है।
  • राजस्थानी मांडना महाराष्ट्र की ‘रंगोली’, बंगाल के अल्पना, उत्तर प्रदेश के ‘चौक पूरना’ और बिहार के ‘एपने’ आदि से केवल आंचलिक रूप से ही अलग है। साधन और श्रम की दृष्टि से ये कलाएं लगभग एक सी है। लोकरंजन और भावाभिव्यक्ति का भी इनमें कोई विशेष अन्तर नहीं हे। मांडना की अलंकृत परिकल्पनाओं का प्रचलन यहां प्राचीन काल से ही रहा है। जन जीवन में कलात्मक अभिरुचि उत्पन्न होने के साथ-साथ् ही मांडना अलंकरण की प्रथा भी चल निकली।
  • राजस्थान के मांडनों में चौक, चौपड़, संझया, श्रवण कुमार, नागों का जोड़ा, डमरू, जलेबी, फीणी, चंग, मेहन्दी, केल, बहू पसारो, बेल, दसेरो, साथिया (स्वस्तिक), पगल्या, शकरपारा, सूरज, केरी, पान, कुण्ड, बीजणी (पंखे), पंच-नारेल, चंवरछत्र, दीपक, हटड़ी, रथ, बैलगाड़ी, मोर व अन्य पशु पक्षी आदि प्रमुख है।
  • मांडने घर की सुन्दरता में वृद्धि करते हैं। वे उमंग, उत्साह, उल्लास का सृजन भी करते हैं और वातावरण को रस से भर देते हैं।
  • मांडनों की प्राचीनता स्वयंसिद्ध है। वेदों, पुराणों में हवनों और यज्ञों में वेदी और आसपास की भूमि पर हल्दी, कुमकुम आदि से विभिन्न आकृतियां बनाई जाती थी।

गवरी लोक नृत्य



  • गवरी राजस्थान के उदयपुर, डूंगरपुर, सिरोही और बांसवाड़ा क्षेत्र में भीलों का प्रचलित मनोरंजक लोकनृत्य है।
  • भील समुदाय के धार्मिक जीवन में गवरी को विशेष स्थान प्राप्त है।
  • वर्षा ऋतु में भाद्रपद माह से चालीस दिन तक भील समुदाय गवरी नृत्य उत्सव बड़े उल्लास से मनाते हैं। गांव या शहर के चौराहों अथवा खुले आंगन में यह लोकनृत्य आयोजित किया जाता है। यह एक संस्कारपूर्ण पावन लोकनृत्य है। इसमें धार्मिक और सांसारिक कार्यों का मिला-जुला रूप दिखाई देता है।
  • यह राजस्थान का सबसे प्राचीन लोक नाट्य है जिसे लोक नाट्यों का मेरुनाट्य कहा जाता है। 
  • इस लोक नृत्य के साथ लोक प्रचलित शिव तथा भस्मासुर की कथा जुड़ी हुई है।
  • एक बार भस्मासुर नामक एक असुर ने तपस्या करके भगवान शिव से भस्मी का कड़ा प्राप्त कर लिया। बाद में मदान्ध होकर उस कड़े से जब उसने शिव को ही भस्म करने का प्रयत्न किया तो विष्णु जी ने मोहनी का रूप धारण करके भस्मासुर को मारा।
  • भगवान शिव भीलों के प्रमुख देवता माने जाते हैं अतः भीलों ने गवरी के रूप में उनके जीवन की सर्वाधिक प्रभावशाली घटना को अपनाया और उनके प्रति श्रद्धा एवं भक्ति का परिचय देने के लिए इस नृत्य का आयोजन आरम्भ किया।
  • गवरी का प्रदर्शन केवल भील लोग ही करते हैं। इस नृत्य के साथ भीलों का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है और वे ही इसके एक मात्र उपासक, आयोजक एवं अभिनेता कहे जाते हैं। गवरी नृत्य उत्सव भीलों की एकता, दक्षता एवं ग्रामीण जीवन और आदिम जातीय जीवन के सम्बन्धों का सूचक है। यह एक रोचक तथ्य है कि इस उत्सव में सिर्फ पुरुष ही भाग लेते हैं। औरत का अभिनय भी वे स्वयं ही करते हैं।
  • यह उत्सव देवी गौरी के सम्मान में मनाया जाता है, परन्तु स्त्रियों को इस धार्मिक कार्य में भाग लेने योग्य नहीं समझा जाता। भील परिवार का प्रत्येक सदस्य इसमें भाग लेना अपना धार्मिक कर्त्तव्य समझता है। इस नृत्य का प्रदर्शन प्रतिदिन एक ही स्थान पर नहीं होता वरन् विभिन्न गावों की यात्रा करते हुए इसका प्रदर्शन किया जाता है।
  • गवरी अभिनेता पूरे सवा महीने तक एक ही पोशाक धारण किये रहते है।
  • इस नृत्य में मुख्यतः चार प्रकार के पात्रों की अवधारणा होती है। देव कालका तथा शिव एवं पार्वती के साथ ही अन्य पात्र इस प्रकार हैः
  • मानव पात्रः- बुढ़िया, राई, कूट-कड़िया, कंजर-कंजरी, मीणा, नट, बणिया, जोगी, बनजारा-बनजारिन तथा देवर-भोजाई इत्यादि।
  • दानव पात्रः- भंवरा, खडलियाभूत, हठिया, मियावाड़।
  • पशु पात्रः- सुर (सुअर), रीछड़ी (मादा रीछ), नार (शेर) इत्यादि।
  • झामट्या लोक भाषा में कविता बोलता है तथा खटकड़िया उसे दोहराता है। 
  • गांव के बीच किसी खुले स्थान - जैसे खेत, खलिहान, चौराहा या टेकरी में देवी का स्थान बनाया जाता है। जय शंकर महादेव, जय गौरी माई आदि नारों के साथ इस स्थान पर त्रिशूल रूप में शिव व अन्य देवी-देवताओं की स्थापना करके, धूप देकर भोपा द्वारा अपने शरीर में देवी की आत्मा को आमंत्रित किया जाता है।
  • मृदंग तथा जालर के संगीत में सभी मग्न हो जाते है।
  • लोक-जीवन के सांस्कृतिक उन्नयन में लोकनृत्य गवरी का उल्लेखनीय योगदान रहा है। सांस्कृतिक भेदभाव तथा ऊंच-नीच जैसी कोई भावना उन्होंने पनपने नहीं दी है।
  • गवरी की यह सांस्कृतिक निधि हमारी रूढ़ियों, परम्पराओं, रीतियों, विश्वासों, मान्यताओं तथा सम्भ्रान्त चेतनाओं की एक ऐसी सम्पत्ति है जिसमें हमारा लोक-जीवन समृद्ध बना हुआ है।
  • गवरी किसी वर्ग या जाति विशेष की धरोहर नहीं है। उसका क्षेत्र सीमित होते हुए भी वह समग्र लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। आपसी मेलजोल, एकता और सत्य की विजय तथा कला एवं संस्कृति का आदान-प्रदान ही इस नृत्य के मूल में निहित रहा है।



Tuesday, 6 February 2018

राजस्थान के लोक वाद्य



  • वे वाद्य यंत्र जो लोक गीत एवं लोक नृत्यों के साथ प्रयुक्त होते हैं लोकवाद्य कहलाते हैं।
  • राजस्थान में कई श्रेणी के लोक वाद्य है जिनमें प्रमुख श्रेणी हैं - तत्, घन, सुषिर और अवनद्ध वाद्य।

अवनद्ध (ताल) वाद्य (चमड़े से मढ़े हुए) - 

तत् वाद्य -

घनवाद्य -

सुषिर वाद्य - 

1.       जिसके एक ही ओर खाल मढ़ी होजैसे - खंजरीचंगडफडैंरूधौंसातासाकुंड़ी
2.       जिनका घेरा लकड़ी या धातु का हो तथा चमड़ा दोनों ओर मढ़ा होजैसे - मांदलढोलडमरूपखावज
3.       जिनका ऊपरी भाग खाल से ढका हो तथा कोटरीनुमा नीचे का भाग बंद रहता होजैसे- नोबतनगाड़ामाठदमामामाटा।

जन्तर,
इकतारारावणहत्थासारंगी,
चिकाराभपंगकमठकामायचा,
टोटो,
चौतारारवाज,
तन्दुरा,
निशान।

मंजीरा,
झांझ,
करताल,
खड़ताल,
झालर,
चिमटा

बांसुरी,
अलगोजापूंगीशहनाई,
सतारा,
मश्कनड़,
मोरचंग,
बांकिया,
भूंगल,
नागफनी।


सुषिर वाद्य-

  • वे वाद्ययंत्र जो फूंक से बजाये जाते हैं। इस श्रेणी के प्रमुख वाद्ययंत्र निम्नलिखित है-

अलगोजा - 
  • यह बांसुरी के समान बांस की नली से बना वाद्य होता है। इसमें नली के ऊपरी मुख को छीलकर उस पर लकड़ी का गट्टा चिपका दिया जाता है जिससे आवाज निकलती है।
  • वादक एक साथ दो अलगोजे एक साथ मुंह में रखकर बजाता है। अलगोजा वाद्य को आदिवासी भील व कालबेलिया जाति का प्रिय वाद्य है।

नड़ -
  • कगौर वृक्ष की 1 मीटर लम्बी लकड़ी से बनाया जाता है। 
  • माता या भैरव के राजस्थानी भोपे तथा लंगा जाति द्वारा भी बजाया जाता है।
  • करणा भील प्रसिद्ध नड़ वाद्यकार रहा।

सतारा -
  • यह अलगोजा, बांसुरी और शहनाई का समन्वित रूप है। इसमें अलगोजे के समान दो नलियों तथा बांसुरी के समान छः छेद होते हैं।
  • इससे किसी भी इच्छित छेद को बन्द करके आवश्यकतानुसार सप्तक में परिवर्तन किया जा सकता है।
  • सतारा जैसलमेर व बाड़मेर क्षेत्र में गडरिया, मेघवाल और मुस्लिम जाति के गायक बजाते हैं।

पूंगी -
  • घीया या तुम्बे से बना होता है।
  • तुम्बी का पतला भाग लगभग डेढ़ बालित लम्बा होता है।
  • नीचे का हिस्सा गोलाकार होता है।
  • सपेरा जाति, कालबेलिया व जोगी बजाते हैं।

मोरचंग -
  • (आरएएस मुख्य परीक्षा 2010 में)
  • लोहे से बने इस वाद्य को होठों के बीच में रखकर बजाया जाता है।
  • यह एक गोलाकार हैण्डिल से दो छोटी और लम्बी छड़ें निकली होती हैं, इनके बीच में पतले लोहे की लम्बी रॉड रहती है जिसके मुंह पर थोड़ा-सा घुमाव दे दिया जाता है।
  • लंगा जाति द्वारा।

सींगी - 
  • हिरण, बारहसिंगा, भैंसे के सींगों से बना होता है।
  • जोगियों द्वारा बजाया जाता है।

नागफणी - 
  • पीतल की सर्पाकार नली जिसके पिछले हिस्से में छेद होता है।
  • साधु-संन्यासियों द्वारा मन्दिरों में 

तत् वाद्य -

  • वे वाद्य यंत्र जो तार से बने होते हैं। तारों के द्वारा स्वर उत्पत्ति वाले वाद्ययंत्र।

इकतारा -
  • छोटे से गोल तुम्बे में बांस की डंडी फंसाकर बनाते हैं।
  • तुम्बे का छोटा भाग बकरे के चमड़े से मढ़ दिया जाता है।
  • तुम्बे पर बांस की दो खूंटियां लगी होती हैं और ऊपर-नीचे दो तार बंधे होते हैं।
  • इसे नाथ, कालबेलियों और साधु-संन्यासियों द्वारा बजाया जाता है।

चिकारा -
  • कैर की लकड़ी से बना। इनका एक सिरा प्याले के आकार का होता है। जिसके तीन तार होते हैं। गज की सहायता से बजाया जाता है।
  • जोगियों, मेवों द्वारा अलवर में, गरासियों द्वारा उदयपुर, पाली, सिरोही में बजाया जाता है।

जन्तर - 
  • वीणा की आकृति से मिलते इस वाद्य में दो तुम्बे होते हैं। 
  • इसकी डांड बांस की होती है। जिस पर मगर की खाल से बने 22 पर्दे मोम से चिपकाये जाते हैं। परदों के ऊपर पांच या छः तार लगे होते हैं।
  • इस वाद्य यंत्र का प्रयोग बगड़ावतों की कथा गाते समय गूजरों के भोपे गल में लटकाकर करते हैं।

रावण हत्था- 
  • इस वाद्य यंत्र को आधे कटे नारियल की कटोरी पर खाल मढ़ कर बनाया जाता है।
  • इसकी डांड बांस की होती है, जिसमें खूंटिया लगा दी जाती है और नौ तार बांध दिये जाते हैं। 
  • रावण हत्थे की गज धनुष के समान होती है तथा इस पर घोड़े के बाल व घुघरु बंधे होते हैं।
  • इसका प्रयोग पाबूजी, डूंगजी- जंवार जी के भोपे कथाएं गाते समय करते हैं।
  • डूंगजी, पाबूजी के भोपे फड़ बांचते समय रावण हत्थे का प्रयोग करते हैं।

सारंगी -
  • तत् वाद्यों में श्रेष्ठ लोकवाद्य। 
  • सारंगी सागवान, कैर या रोहिड़े की लकड़ी से बनाई जाती है। इसमें कुल 27 तार होते हैं तथा ऊपर की तांते बकरे की आंतों से बनाई जाती हैं।
  • इसका वादन घोड़े की पूंछ के बालों से निर्मित गज से किया जाता है। 
  • सारंगी जैसलमेर और बाड़मेर के लंगा जाति के गायकों तथा मारवाड़ के जोगियों द्वारा गोपीचंद, भर्तृहरि, निहालदे आदि के ख्याल गाते समय प्रयुक्त की जाती है।

भपंग -
  • डमरु की आकृति वाला तुम्बे से बना।
  • भपंग अलवर व मेव क्षेत्र के जोगी प्रमुखतया बजाते हैं।
  • जहूर खां मेवाती प्रसिद्ध भपंग वादक।

कामायचा -
  • यह राजस्थान का प्रसिद्ध तत् लोकवाद्य है जो सारंगी के समान वाद्य है जिसकी तबली चमड़े से मढ़ी गोल व लगभग डेढ़ फुट चौड़ी होती है।
  • इसको बजाने की गज में 27 तार लगे होते हैं। तार बकरे की तांत के बने होते हैं।
  • इसे जैसलमेर, बाड़मेर क्षेत्र में मांगणियार जाति के लोग बजाते हैं। 
  • नाथ पंथ के साधु भर्तृहरि व गोपीचन्द के गीत इस पर गाते हैं।

रवाज़ -
  • यह सारंगी के समान वाद्य है जिसे नखों से बजाया जाता है।
  • इसमें तारों की संख्या 12 होती है।
  • मेवाड़ के राव व भाट जाति के लोग बजाते हैं।

अवनद्ध वाद्य - 

  • ताल से बजने वाले वाद्य

चंग -
  • यह होली पर बजाया जाने वाला प्रमुख ताल वाद्य है। इसे ढप भी कहा जाता है।
  • च्ंग का गोला छोटा लकड़ी से बना हुआ होता है और इसके एक तरफ बकरे की खाल मढ़ दी जाती है। 
  • इसे बजाने वाला कन्धे पर रखकर जाता है। 

डफ -
  • होली के अवसर पर 
  • लोहे या लकड़ी के बड़े चक्र पर खाल मढ़कर। चंग से बड़ा होता है।

माठा - 
  • पाबूजी के पवाड़ों के वाचन के समय भोपे बजाते हैं।

खंजरी -
  • आम की लकड़ी का बना वाद्ययंत्र, जिसे एक ओर खाल से मढ़ा जाता है।
  • राजस्थान में कामड़, भील, नाथ और कालबेलिया जाति के लोग खंजरी बजाते हैं।

डैरूं -
  • आम की लकड़ी का बना वाद्ययंत्र, जिसके दोनों तरफ चमड़ा मढ़ दिया जाता है।
  • गोगाजी के पुजारी इसे बजाते हैं 
  • इसके बीच के हिस्से को दाहिने हाथ स पकड़ते हैं और रस्सी को खींचने पर आवाज उत्पन्न होती है।

मांदल - 
  • यह मृदंग के समान होता है तथा मिट्टी से बनाया जाता है।
  • इसका एक मुंह छोटा व दूसरा बड़ा होता है। इसका मढ़ी हुई खाल पर जौ का आटा चिपकाकर बनाया जाता है।
  • इसे शिव-गौरी का वाद्ययंत्र माना जाता है।

घन वाद्य

  • वे वाद्य यंत्र जो धातु के बने होते हैं।
मंजीरा -
  • यह पीतल और कांसे की मिश्रित धातु का गोलाकार वाद्य होता है। इनके मध्य भाग में छेद कर दो मंजीरों को रस्सी से बांध दिया जाता है।
  • तेरहताली नृत्य में मंजीरे प्रमुख वाद्य यंत्र है।

खड़ताल -
  • यह दो लकड़ी के टुकड़ों के बीच में पीतल की छोटी-छोटी गोल तश्तरियां लगी रहती है जोकि लकड़ी के टुकड़ों को आपस में टकराने से बजती है।
झांझ -
  • यह मंजीरे का विशाल रूप है, इसका व्यास लगभग एक फुट होता है।
  • यह शेखावाटी क्षेत्र के कच्छी घोड़ी तृत्य में ताशें के साथ बजाया जाता है।


जूनागढ़ दुर्ग


  • राजस्थान वैसे तो वीरों की भूमि है किन्तु यहां का स्थापत्य कला भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। बीकानेर के मध्य में स्थित जूनागढ़’ दुर्ग का महत्व मात्र इसलिए नहीं है कि यह खाई और दृढ़ प्राचीरों से घिरा एक विशाल किला है।
  • इसे लालगढ़ दुर्ग भी कहते हैं।
  • यह पारिख, धान्व दुर्ग श्रेणी में आता है। 
  • इस दुर्ग का महत्त्व इसलिए भी है कि यहां हमें प्रस्तर शिल्पभित्ति चित्रण तथा लकड़ी और कांच की अद्भुत जड़ाई देखने को मिलती हैं।
  • बीकानेर की स्थापना राव जोधाजी के पुत्र राव बीकाजी ने सन 1477 ई. में की थीजबकि जूनागढ़ का निर्माण रावराजा रायसिंह के शासनकाल में 1589 ई. हुआ।
  • जूनागढ़ दुर्ग के निर्माण में मुख्यतः दो प्रकार के पत्थरों का उपयोग किया गया है। पीला पत्थर जिसे जैसलमेर से लाया गया तथा लाल पत्थर बीकानेर के दलमेरा’ गांव की पत्थर की खान से लाया गया। इसलिए इसे लालगढ़ भी कहा जाता है। इन दोनों पत्थरों के साथ ही जूनागढ़ की कलात्मकता को विकसित करने के लिए संगमरमर का भी उपयोग किया गया।
  • इस दुर्ग का निर्माण कार्य एक राजा के शासनकाल में पूर्ण नहीं हुआबल्कि इसे निर्मित होने में पूरी चार शताब्दियां लगी।
  • राव रामसिंह के बाद के विभिन्न शासकों ने उनके द्वारा आरंभ किए गए इस कार्य का जारी रखाजिससे जूनागढ़’ का वर्तमान स्वरूप में निर्माण संभव हुआ।
  • जूनागढ़ सदैव राव बीकाजी के वंशजों के पास ही सुरक्षित रहा।
  • जूनागढ़ के इतिहास में किसी बड़े आक्रमण अथवा युद्ध का सामना नहीं हुआइस कारण से यहां की कला और शिल्प को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंची।
  • जूनागढ़ के चारों और लगभग 20 फीट चौड़ी और 40 फीट गहरी खाई बनाई गई थी। खाई से पूर्व चार फीट चौड़ी दीवारों का परकोटा बनाया गया। 
  • गढ़ के मुख्य भवन यानि राजमहल तक पहुंचने में कुछ बड़े मजबूत द्वारों से गुजरना होता जिन्हें पिरोल’ कहा जाता है। ये विशाल द्वार बीकानेर के विभिन्न शासकों ने सुरक्षा की दृष्टि से बनवाए। इन द्वारों अथवा पिरोलों को करणपोलदौलतपोल और सूरजपोल आदि नाम दिए गए।
  • जूनागढ़ में निर्मित फूलमहलचन्द्रमहलबीका महलअनूप महलसुजान महलछत्र महलसरदार महल तथा बादल महल आदि भवनों में प्रमुख रूप से तीन प्रकार का कलात्मक अलंकरण देखने को मिलता है।
  • पहला प्रस्तर शिल्प भित्ति चित्रांकन तथा तीसरा लकड़ी और कांच की सज्जा का कलात्मक कार्य।
  • प्रस्तर शिल्प के अंतर्गत हम यहां के महलों के झरोखेनुमा छोटे-छोटे गुम्बदोंजालियोंखम्भोंदरवाजों और गोखों में तराशी गई विविध छवियों को देख सकते हैं। इनमें छैनी तथा हथौड़ी से अनुपम कारीगरी की गई है।
  • यहां के गज मंदिर में जड़ाई का अत्यंत प्रभावपूर्ण काम हुआ है।
  • यहां स्थित मन्दिरों के भीतरी भागों में श्रीकृष्ण के झूलों व अन्य पवित्र प्रतीकों के चित्र देखकर हमें यहां की मथेरन शैली की चित्रकला के विकास का पता चलता है।
  • बीकानेर के राव राजाओं ने मथेरन जाति के लोगों को प्रश्रय दिया।
  • जूनागढ़ के विभिन्न महलों के दरवाजों पर भी अत्यंत आकर्षक एवं मोहक चित्रांकन किया गया है। यहां बनी राधा-कृष्ण की आकृतियों दर्शक को विभोर कर देती हैं।
  • सुजान महल के एक दरवाजे पर 14 चित्र बने हैं। यहीं पर बने बीका महल व सारंगी बजाती युवतियों के चित्र भी सुन्दर है।

  • सुजान महल के नीचे बने बीका महल के द्वारों पर हिन्दुओं के विभिन्न 14 अवतारों के चित्रभित्ति कला के अनुपम उदाहरण है।
  • यहां के बादल महल की छत पर बनाए गए चित्र भी दर्शनीय हैं। लकड़ी की छत पर इन्द्र नीलाभ (आकाश) में परियों के तथा दो अन्य तैल चित्र भी हैं जो काफी आकर्षक बन पड़े हैं। इनमें कम्पनी शैली का प्रभाव है।
  • छत्र महल की छत भी अन्य महलों की भांति लकड़ी की बनी हुई है। इसमें श्रीकृष्ण की रासलीला का चित्रण है। उसे बेल-बूटों से सजाया गया है। ये चित्र लोक चित्र शैली के हैं।
  • जूनागढ़ में बने महलों की छतें लकड़ी के अनुपम शिल्पकाष्ठकला की बारीकियों से सुसज्जित हैं। इनमें बनी हुई विभिन्न डिजाइनों को देखकर हम आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सकते।
  • छतों पर लकड़ी के साथ-साथ चांदी तथा सोने की सजावट का काम भी किया गया है। काष्ठकला की दृष्टि से महलों के द्वार तथा वहां का फर्नीचर भी बेजोड़ है।
  • महलों में हाथी दांतचंदन की लकड़ीअखरोट की लकड़ी तथा पीतल पर किया गया आकर्षक काम यहां के कला वैभव को उजागर करने वाला है।
  • फूल महल के अंदर जयपुर के कारीगरों द्वारा निर्मित शिव-पार्वतीराधा-कृष्ण आदि की मूर्तियां भी बेहद सुन्दर बन पड़ी है।
  • जूनागढ़ में जगह-जगह पर कांच की कारीगरी भी की गई है। छत्रमहल में चीन की नीली टाइलों का प्रयोग किया गया है। जिन पर सुन्दर चित्रण हुआ है।
  • बीकानेर के महाराजा गजसिंह यहां एक मणि मोती जड़ित महल बनाना चाहते थेपर वे उसे पूर्ण नहीं कर पाए। जूनागढ़ की कलात्मक समृद्धि में अधिकतर मुस्लिम कलाकारों ने भी खूब काम किया।
  • यहां पर मुल्तान से आए उस्ता’ जाति के कलाकारों ने भी खूब काम किया। ये ऊंट की खाल पर कलात्मक काम करते थे।  

Monday, 5 February 2018

राजस्थान में पशुधन



  • भारत में प्रथम पशु गणना 1919-20 में हुई थी और तब से यह पशुगणना हर 5 वर्ष बाद भारत में सभी राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा की जाती है।
  • अब तक 19 पशुगणना 15 अक्टूबर, 2012 में की जा चुकी है।
  • गणना का कार्य राज्य पशुपालन विभागों की है।
  • विश्व में सबसे अधिक मवेशी भारत में है।
  • विश्व की कुल भैंसों का 57 प्रतिशत एवं गाय-बैलों का 14 प्रतिशत भारत में है।
  • 19वीं  पशुगणना के अनुसार देश में कुल 512.05 मिलियन यानि 51.2 करोड़ पशु एवं 729.2 मिलियन (72.9 करोड़) मुर्गियां है। पिछली गणना की तुलना में इस बार 3.33 प्रतिशत की कमी हुई है।
  • देश में लगभग 190.9 मिलियन (19.09 करोड़) गौवंश है। 
  • देश का सर्वाधिक पशुधन उत्तरदेश व राजस्थान में तथा मुर्गियों में आन्ध्रप्रदेश है।
  • राजस्थान में कुल पशुधन में वृद्धि 1.89 प्रतिशत की हुई तथा कुल पशुधन 577.32 लाख तथा मुर्गियां 80.2 लाख है।
  • राजस्थान में पशु घनत्व है - 169
  • राजस्थान में सर्वाधिक गायें उदयपुर जिले में, भैंसें जयपुर जिले में, भेड़-बकरियां बाड़मेर में, घोड़े बीकानेर में एवं ऊंट सर्वाधिक जैसलमेर में पाये जाते हैं।
  • 19 सितम्बर, 2014 को राजस्थान सरकार द्वारा ऊंट को पालतू श्रेणी में राज्य पशु घोषित किया गया है। ऊंट के वध व तस्करी को रोकने हेतु अधिनियम 2014 में बनाया गया है।
  • राजस्थान में देश के सर्वाधिक ऊंट, बकरियां एवं गधे हैं।
  • भारत दुग्ध उत्पादन में दुनिया का पहले स्थान पर है। दूसा अमेरिका व तीसरा चीन है।
  • राजस्थान उत्तरप्रदेश के बाद दूसरा स्थान पर है।
ऑपरेशन फ्लडः- 
  • यह कार्यक्रम 1970 ई. में स्व. डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में चलाया गया। ऑपरेशन फ्लड का प्रमुख उद्देश्य दुग्ध उत्पादन को बढ़ाना, दुग्ध उत्पादकों को दूध का उचित मूल्य दिलवाना तथा उपभोक्ताओं तक अच्छी किसस्म के दूध व दुग्ध उत्पादों का वितरण सुनिश्चित करना था।

गौवंश:-
  • राज्य में सर्वाधिक गौवंश - उदयपुर व बीकानेर में 
  • राज्य में न्यूनतम गौवंश - धौलपुर में 

गिर - 
  • मूल रूप से गुजरात के गिरि वन में पायी जाने वाली जाति है।
  • रैंडा तथा अजमेरा नामों से पुकारी जाने वाली यह नस्ल अजमेर, किशनगढ़, चित्तौड़गढ़, बूंदी भीलवाड़ा, पाली, कोटा व उदयपुर जिलों में पायी जाती है।

थारपारकर -
  • उत्पत्ति स्थान ‘मालाणी गांव’ जैसलमेर है।
  • इसे मालाणी या थारी नस्ल भी कहते हैं।
  • यह नस्ल जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, सांचौर (जालौर) में पायी जाती है।

राठी -
  • लाल सिंधी व साहीवाल की मिश्रित नस्ल।
  • दूध देने की दृष्टि से अग्रणी। राजस्थान की कामधेनु कहते हैं।
  • यह जैसलमेर, बीकानेर, श्रीगंगानगर के दक्षिणी-पश्चिमी भाग, व चुरू के कुछ भाग में प्रमुखतया से पायी जाती है।
नागौरी - 
  • इस नस्ल की उत्पत्ति नागौर जिलें का सुहालक प्रदेश है।
  • इस नस्ल का रंग सफेद या भूरा, लंबे मुंह, पतली तथा मजबूत टांगे होती हैं।
  • इस नस्ल के बैल दौड़ने में तेज तथा कृषि कार्यों के लिए उपयुक्त समझे जाते हैं।
  • नागौरी नस्ल प्रमुख रूप से जोधपुर का पूर्वी भाग, नोखा (बीकानेर) तथा रूपनगढ़ (अजमेर) में पायी जाती है।
कांकरेज -
  • मूल स्थान गुजरात का कच्छ का रन।
  • यह नस्ल भारवाहक एवं अच्छा दूध देने वाली है।
  • बाड़मेर, सांचौर व नेहड़ क्षेत्र जालौर, सिरोही

मालवी-
  • मूल स्थान मध्यप्रदेश का मालवा क्षेत्र।
  • बैल भारवाही तथा गायें कम दूध देती हैं।
  • गाय व बैल मध्यम कद, गठीले बदन और सीधी कमर वाले होते हैं।
  • यह नस्ल मध्यप्रदेश राज्य की सीमा से लगे ज़िलों जैसे - बांसवाड़ा, डूंगरपुर, झालावाड़, कोटा व उदयपुर में पायी जाती है।

हरियाणवी -
  • मूल स्थान रोहतक, हिसार व गुडगांव (हरियाणा) 
  • सिर ऊंचा उठा हुआ, चेहरा लम्बा एवं नुकीला होता है
  • यह नस्ल श्रीगंगानगर, चूरू, हनुमानगढ़ सीकर, जयपुर, झुंझुनूं में पायी जाती है।

सांचौरी -
  • यह कम दूध, कांकरेज नस्ल से मिलती-जुलती नस्ल है।
  • उदयपुर, पाली, सिरोही व सांचौर (नागौर) में पायी जाती है।


मेवाती (कोठी) -
  • हल जोतने व बोझा ढोने हेतु उपयुक्त।
  • अलवर, भरतपुर
  • राजस्थान में गौवंश की विदेशी नस्ल भी पायी जाती है -

जर्सी - 
  • मध्य व पूर्वी राजस्थान
  • मूल स्थान अमेरिका 
  • दूध देने में अग्रणी।

हॉलिस्टिन -
  • मूल स्थान - हॉलैण्ड व अमेरिका।
  • सर्वाधिक दूध देने वाली नस्ल।


भैंसवंश:-

  • राज्य में सर्वाधिक - जयपुर, अलवर, भरतपुर
  • राज्य में न्यूनतम - जैसलमेर
  • देश में सर्वाधिक भैंसे उत्तरप्रदेश में, राजस्थान दूसरे स्थान पर है।
  • राजस्थान में भैंस की मुख्यतः चार नस्लें पायी जाती हैं-

मुर्रा -

  • दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानी जाती है तथा यह जयपुर, उदयपुर, अलवर, भरतपुर व गंगानगर जिलों में पायी जाती है।
  • इसे खुण्डी भी कहा जाता है।

जाफराबादी -
  • गुजरात का काठियावाड़ मूल स्थान है।
  • गुजरात से लगे हुए दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान के क्षेत्र
  • नागपुरी
  • बदवरी
  • सूरती
भेंड़:- 
  • राजस्थान की जलवायु भेड़ पालन हेतु सर्वाधिक उपयुक्त है, विशेषकार शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क जलवायु इनके लिए उपयुक्त होती है।
  • वर्ष 2007 में राज्य में भेड़ों की कुल संख्या 111.89 लाख थी। राज्य में सर्वाधिक भेड़ बाड़मेर जिले में 13.71 लाख थी। 
  • इसके बाद जैसलमेर है।
  • न्यूनतम - बांसवाड़ा
  • भेंड की प्रमुख नस्ले इस प्रकार है -
1. जैसलमेरी:- 
  • यह जैसलमेर में पाई जाती है।
2. नाली:- 
  • हनुमानगढ़, चूरु, बीकानेर था झुँझुनूं जिलों में पाई जाती है। ये अधिक ऊन के
  • लिए प्रसिद्ध है। इसकी ऊन मोटी, घनी एवं लम्बे रेशे वाली होती है।
3. मालपुरी:- 
  • इसे ‘‘देशी नस्ल’’ भी कहा जाता है। 
  • यह जयपुर, दौसा, टोंक, करौली तथा सवाई माधोपुर जिलों में पाई जाती है।
4. मगरा:- 
  • इसे चकरी व बीकानेरी चौकला भी कहते हैं। इससे प्राप्त ऊन के रेशे की लम्बाई 10 से 12 सेमी तक होती है। यह प्रतिवर्ष औसतन 2 किलोग्राम ऊन देती है।
  • इस नस्ल की भेड़ अधिकांशतः जैसलमेर, बीकानेर, चूरु, नागौर आदि में पायी जाती है।
5. पूगल:-
  • इनका उत्पत्ति स्थान बीकानेर की तहसील ‘‘पूगल’’ होने के कारण इस का नाम पूगल हो गया।
6. मारवाड़ी:-
  • राजस्थान की कुल भेड़ों में सर्वाधिक भेड़ें मारवाड़ी नस्ल (लगभग 45 प्रतिशत) की है। इन भेड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। 
  • ये राजस्थान में सर्वाधिक जोधपुर, बाड़मेर, पाली, दौसा, जयपुर आदि जिलों में पाई जाती है।
7. चोकला या शेखावाटी:- 
  • इसे भारत की ‘मेरिनो’ भी कहा जाता है। 
  • चूरु, झुंझुनूं व सीकर, बीकानेर ज़िले में पायी जाती है। इसे छापर नाम से भी जाना जाता है।
  • यह सबसे उत्तम किस्म की ऊन देने वाली नस्ल है। यह प्रतिवर्ष 1.4 से 2.3 किलो तक ऊन प्राप्त होती है।
8. सोनाड़ी (चनोथर):- 
  • राजस्थान में बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, डूँगरपुर, उदयपुर जिलों में पाई
  • जाती है। प्रतिदिन 1 किलोग्राम दूध देने वाली इस भेड़ की ऊन का रेशा मोटा होता है। जब यह भेड़ जमीन पर घास चरती है तो इसके कान जमीन को स्पर्श करते हैं।
9. खेरी:-
  • जोधपुर, नागौर और पाली ज़िलों के घुमक्कड़ रेवड़ों में पाई जाने वाली इस नस्ल की भेड़ की ऊन सफेद और मध्यम किस्म के गलीचों के लिए उपयुक्त है। 

Sunday, 4 February 2018

राजस्थान के प्रसिद्ध लोक नृत्य


क्षेत्रीय लोकनृत्य

  • क्षेत्रीय स्तर पर विकसित होने वाले लोकनृत्यों में मेवाड़ क्षेत्र का गैर नृत्य, शेखावाटी का गींदड एवं चंग नृत्य, मारवाड़ का डांडिया नृत्य, जालौर का ढ़ोल नृत्य, बीकानेर के नाथ-सिद्ध का अग्नि नृत्य, अलवर तथा भरतपुर का बम नृत्य और सम्पूर्ण राजस्थान का घूमर नृत्य मुख्य है। 

गैर -

  • मेवाड़ तथा बाड़मेर क्षेत्र में लकड़ी हाथों में लेकर पुरुष गोल घेरे में जो नृत्य करते हैं, वह गैर नृत्य कहलाता है। 
  • गैर नृत्य करने वालों को गैरिया कहते हैं।
  • यह होली के दूसरे दिन से प्रारम्भ होता है तथा लगभग 15 दिन तक चलता है।
  • इसमें चौधरी, ठाकुर, पटेल, पुरोहित, माली आदि जाति के पुरुष उत्साह के साथ भाग लेते हैं। 
  • ढोल, बांकिया और थाली आदि वाद्यों के साथ किये जाने वाले गैर नृत्यों के साथ भक्तिरस और श्रृंगार रस के गीत गाये जाते हैं।
  • गैर नृत्य करने वाले सफेद धोती, सफेद अंगरखी, सिर पर लाल अथवा केसरिया रंग की पगड़ी पहनते हैं। 
  • ओंगी के ऊपर लाल रंग की लम्बी फ्राक की भांति परिधान पहना जाता है। 
  • कमर में तलवार बांधने के लिए पट्टा बंधा होता है।

गींदड़ नृत्य -

  • गींदड़ नृत्य का प्रमुख क्षेत्र शेखावाटी है जिसमें सीकर, लक्ष्मणगढ़, रामगढ़, झुंझुनूं, चूरू तथा सुजानगढ़ आदि स्थान आते हैं।
  • गींदड़ नृत्य भी होली पर किया जाता है।
  • होली का डांड रोपे जाने के बाद इस नृत्य को खुले मैदान में सामूहिक उत्साह के साथ आरम्भ करते हैं।
  • यह नृत्य एक सप्ताह की अवधि तक चलता है।
  • गींदड़ नृत्य नगाड़े की थाप के साथ डण्डों की परस्पर टकराहट से शुरू होता है।
  • नर्तकों के पैरों की गति नगाड़े की ताल पर चलती है। 
  • नगाड़ची आगे-पीछे डांडिया टकराते हैं और ठेके की आवृत्ति के साथ नर्तकों के कदम आगे बढ़ते रहते हैं।
  • यह एक प्रकार का स्वांग नृत्य है।
  • अतः नाचने वाले शिव, पार्वती, राम, कृष्ण, शिकारी, योद्धा आदि विविध रूप धारण करके नृत्य करते हैं।
  • शेखावाटी क्षेत्र में चंग नृत्य में लोग एक हाथ में डफ थामकर दूसरे में हाथ में कठखे का ठेका लगाते हैं। चूड़ीदार पायजामा, कुर्त्ता पहनकर, कमर में रूमाल और पांवों में घुंघरू बांधकर होली के दिनों में किये जाने वाले इस चंग नृत्य के साथ लय के गीत भी गाये जाते हैं।

कच्छी घोड़ी नृत्यः-


  • शेखावाटी क्षेत्र में 
  • लोकप्रिय वीर नृत्य है।
  • यह पेशेवर जातियों द्वारा मांगलिक अवसरों पर अपनी कमर पर बास की घोड़ी को बांधकर किया जाने वाला नृत्य है।
  • इसमें वाद्यों में ढोल बाकियां व थाली बजती है।
  • सरगड़े कुम्हार, ढोली व भांभी जातियां नृत्य में भाग लेती है।
  • इसमें लसकरिया, बींद, रसाला तथा रंगमारिया गीत गाए जाते हैं।

डांडिया -

  • डांडिया नृत्य का क्षेत्र मारवाड़ है। 
  • गैर नृत्य की भांति इसमें भी लकड़ी की छड़िया पकड़ने की प्रथा है।
  • यह समूहगत गोला बनाकर किया जाने वाला नृत्य है जिसके अन्तर्गत कोई 20-25 नर्तक शहनाई तथा नगाड़े की धुन एवं लय पर डांडिया टकराते हुए आगे बढ़ते हुए नृत्य करते है।
  • होली के बाद प्रारम्भ होने वाले डांडिया नृत्य के दौरान भी स्वांग भरने की प्रथा होती है। नर्तक इसमें राजा, रानी, श्रीराम, सीता, शिव, श्रीकृष्ण आदि के विविध रूप धरकर नाचते हैं।  जो व्यक्ति राजा बनता था मारवाड़ी नरेशों की भांति पाग, तुर्रा, अंगरखी व पायजामा आदि पहनकर सजता था।

तेरहताली:- 

  • बाबा रामदेव की आराधना में कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा तेरहताली 13 मंजिरों की सहायता से किया जाता है।
  • पाली, नागौर एवं जैसलमेर में

नाहर नृत्य:-

  • होली के अवसर पर माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) में भील, मीणा, ढोली, सरगड़ा आदि।
  • पुरुषों द्वारा रूई को शरीर पर चिपका कर नाहर (शेर) का वेश धारण करते हुए किया जाता है।
  • वाद्य यंत्र ढोल, थाली, नगाड़ा आदि

ढोल नृत्यः-

  • जालौर क्षेत्र का नृत्य।
  • केवल पुरुषों के द्वारा किया जाने वाला 
  • शादी के दिनों में उत्साह के साथ किया जाता है।
  • ढोल बजाने वाले एक मुखिया के साथ इसमें 4-5 लोग और होते हैं। 
  • ढोल का स्थानीय थाकना शैली में बजाया जाता है।
  • थाकना के बाद विभिन्न मुद्राओं व रूपों में लोग इस लयबद्ध नृत्य में शरीक होते हैं।

अग्निनृत्य - 

  • जसनाथी सम्प्रदाय के जाट सिद्धों द्वारा किया जाता है।
  • यह नृत्य धधकते अंगारों के बीच किया जाता है।
  • इसका उद्गम स्थल बीकानेर ज़िले का कतियासर ग्राम माना जाता है।
  • जसनाथी सिद्ध रतजगे के समय आग के अंगारों पर यह नृत्य करते हैं।
  • पहले के घेरे में ढेर सारी लकड़ियां जलाकर धूणा किया जाता है।
  • उसके चारों ओर पानी छिड़का जाता है। नर्तक पहले तेजी के साथ धूणा की परिक्रमा करते हैं और फिर गुरु की आज्ञा लेकर ‘फतह, फतह’ यानि विजय हो विजय हो कहते हुए अंगारों पर प्रवेश कर जाते हैं।
  • अग्नि नृत्य में केवल पुरुष भाग लेते हैं। वे सिर पर पगड़ी, अंग में धोती-कुर्ता और पांवों में कड़ा पहनते हैं। 

बम नृत्य -

  • बम वस्तुतः एक विशाल नगाड़े का नाम है जिसे इस हर्षपूर्ण नृत्य के साथ बजाया जाता है। इसे ‘बम रसिया’ भी कहते हैं।
  • नई फसल आने की खुशी में फाल्गुन के अवसर पर बजाया जाता है। 
  • यह विशेष रूप से भरतपुर व अलवर क्षेत्र में प्रचलित है। 

घूमर -

  • घूमर नृत्य को राजस्थान के किसी एक क्षेत्र का नृत्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसका प्रचलन राजस्थान के प्रायः सभी क्षेत्रों में है।
  • इसे ‘लोकनृत्यों की आत्मा’ कहते हैं। यह राजस्थान का ‘राज्य नृत्य’ है।
  • तीज-त्यौहार तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर महिलाओं द्वारा आकर्षक पोशाक पहनकर किया जाने वाला यह लोकप्रिय नृत्य है।
  • महिलाएं जो बड़ा घुमावदार घाघरा पहनकर नाचती है उसी के आधार पर इसका नाम घूमर रखा गया। 
  • घूमर के साथ अष्टताल कहरवा लगाया जाता है जिसे सवाई कहते हैं। 
चरी नृत्य

  • किशनगढ़ी गुर्जरों द्वारा किया जाने वाला चरी नृत्य प्रसिद्ध है। इसमें सिर पर चरी रखने से पूर्व नत्रकी घूंघट कर लेती है और हाथों के संचालन द्वारा भाव प्रकट करती हैं, इसके साथ ढोल, थाल, बांकिया आदि वाद्यों का प्रयोग होता है।
  • व्यवसायिक लोक नृत्यों में तेरहताली, भवाई और कच्छी घोड़ी आदि लोक नृत्य है।

भवाई नृत्य

  • भवाई नृत्य सिर पर मटके रखकर, हाथ, मुंह तथा पांवों आदि अंगों के चमात्कारिक प्रदर्शन के साथ किया जाता है। 
  • जमीन से मुंह में तलवार या रूमाल उठाकर, पांव से किसी वस्तु को थामकर या अन्य किसी प्रकार से दर्शकों को चमत्कृत करके यह नृत्य किया जाता हे। कई बार कांच के टुकड़ों और तलवार की धार पर यह नृत्य किया जाता है। 
  • बाबा के रतजगे में जब भजन, ब्यावले ओर पड़ बांचना आदि होता है तो स्त्रियां मंजीरा, तानपुरा और चौतारा आदि वाद्यों की ताल पर तेरहताली नृत्य का प्रदर्शन करती है। इनके हाथों में मंजीरे बंधे होते हैं जो नृत्य के समय आपस में टकराकर बजाये जाते हैं।
  • गरासिया जाति में घूमर, लूर, कूद और भादल नृत्यों प्रमुख है। गरासिया स्त्रियां अंगरखी, घेरदार ओढ़नी तथा झालरा, हंसली, चूडा आदि पहनती हैं। इनके नृत्य बांसुरी, ढोल व मादल आदि वाद्यों के साथ होते हैं।


दुनिया के वे देश जिनका रक्षा बजट है सबसे अधिक

1 फरवरी, 2019 को भारत के वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने अंतरिम बजट पेश किया और उसमें अपने देश की सुरक्षा के लिए रक्षा बजट का आवंटन तीन लाख...