Saturday, 24 February 2018
राजस्थान के प्रमुख उद्योग-धंधे
सूती वस्त्र उद्योगः-
- राजस्थान का सबसे पुराना एवं वृहद् उद्योग सूती वस्त्र उद्योग है।
- 1949 में राज्य में 7 सूती वस्त्र मिलें थी, जिनकी संख्या बढ़कर वर्तमान में 23 हो गई है।
- वर्तमान में राज्य में 17 मिलें निजी क्षेत्र, 3 सार्वजनिक क्षेत्र (दो ब्यावर, एक विजयनगर में) तथा 3 सहकारी कताई मिलें (गुलाबपुरा, गंगापुर व हनुमानगढ़) कार्यरत हैं।
Wednesday, 21 February 2018
राजस्थान में हुए प्रमुख जौहर एवं साके
- राजपूताना में प्राचीन काल में जब युद्ध हुआ करते थे तो राजपूत वीरांगनाओं द्वारा अग्निकुंड या पानी में कूदकर जान दे देना जौहर कहलाता है।
- इसी प्रकार राजपूत वीर केसरिया रंग के वस्त्र पहनकर युद्धभूमि में ही वीरगति को प्राप्त हो जाना केसरिया कहलाता है।
- जब जौहर और केसरिया दोनों एक साथ होते हैं, तब उसे साका कहते हैं।
- जब कभी जौहर व केसरिया में से कोई एक ही हो, तब उसे अर्द्ध साका कहते हैं।
क्यो होते थे साका व जौहर
- मध्यकालीन राजस्थान में जब तुर्क और मुगलों के आक्रमण हुए तब राजपूतों ने इसके प्रतिउत्तर में कड़ा प्रतिरोध किया। राजपूत प्रारम्भ से ही अपने स्वाभिमान और वीरता के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणोत्सर्ग करने में हिचकिचाहट महसूस नहीं की।
- यही नहीं राजपूताने की वीरांगनाएं भी अपनी आनबान की रक्षा के लिए प्रसिद्ध रही है। वे अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अग्नि व जल में कूदकर जान दे देना ही उचित समझती थी। क्योंकि कोई भी विदेशी आक्रमणकारी पराजित राजाओं की प्रजा व महिलाओं के साथ जबरदस्ती करते थे। इससे बचने के लिए वे रानियों के साथ जौहर कर लेती थी।
प्रमुख साके:-
रणथम्भौर का साका -
- यह राजस्थान का पहला साका था। 1301 ई. में हम्मीर देव चौहान के समय दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण कर दिया। इस पर आक्रमण का कारण हम्मीर देव की शरणागत की रक्षा करने की हठधर्मिता थी जो उन्होंने खिलजी के विरोधी को शरण दी थी। राजपूतों ने केसरिया पहना तो महिलाओं ने जल जौहर किया।
मेवाड़ के प्रमुख साके
- चित्तौड़गढ़ का पहला साका 1303 ई. में हुआ जो दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हुआ था। इस समय यहां का शासक रावल रत्नसिंह था।
- अलाउद्दीन ने धोखे से रत्नसिंह को कैद कर लिया और बदले में रानी पद्मिनी को मांगा लेकिन राजपूत वीरों ने केसरिया बाना पहनकर वीरता पूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और रानी ने 1600 महिलाओं के साथ जौहर कर लिया। खिलजी ने दुर्ग का नाम खिज्राबाद रख दिया।
- 1534 ई. में चित्तौड़गढ़ का दूसरा साका गुजरात के शासक बहादुरशाह के आक्रमण पर हुआ। इस समय राजमाता कर्मावती ने जौहर किया।
- 1567-68 ई. में मुगल बादशाह अकबर के समय उदयसिंह यहां का शासक था। इसमें जयमल राठौड़ और पत्ता वीरगति को प्राप्त हुए तथा राजपूत वीरांगनाओं ने जौहर किया।
जैसलमेर के प्रमुख साके
- जैसलमेर में पहला साका अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हुआ था। जैसलमेर के शासक रावल मूलराज व कुंवर रतनसी वीरगति को प्राप्त हुए एवं वीरांगनाओं ने जौहर किया।
दूसरा साका -
- फिरोजशाह तुगलक के समय हुआ।
- इस समय रावल दूदा व त्रिलोकसी के नेतृत्व में राजपूत ने युद्ध लड़ा
तीसरा साका -
- यह अर्द्ध साका था जो 1550 ई. में कंधार के अमीर अली पठान के आक्रमण के समय रावल लूणकरण अन्य वीर योद्धओं के साथ वीरगति को प्राप्त हुए।
सिवाना दुर्ग के साके -
पहला साका 1309 ई. में
- अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया। इसे जीतकर इसका नाम खैराबाद रखा।
- शासक सातलदेव था जो वीरगति को प्राप्त हुआ।
दूसरा साका -
- अकबर के समय में हुआ।
- शासक कल्लाजी वीरगति को प्राप्त हुए
- वीरांगनाओं ने जौहर किया।
जालोर का साका
- 1311-12 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने जालोर पर आक्रमण कर दिया जिसके प्रतिरोध में जालोर के शासक कान्हड़देव चौहान व उनके पुत्र वीरमदेव ने बड़ी बहादुर के साथ प्रतिरोध किया और वीरगति को प्राप्त हुए। राजपूत वीरांगनाओं ने जौहर किया।
- अलाउद्दीन ने दुर्ग को जीतकर उसका नाम जलालाबाद रख दिया।
- इसका घटना का वर्णन पद्मनाभ द्वारा रचित कान्हड़देव प्रबंध नामक ग्रंथ में मिलता है।
गागरोन के साके
पहला साका 1423 ई. में
- मांडू के सुल्तान अलपखां गौरी (होशंगशाह) ने आक्रमण किया।
- गागरोन के शासक अचलदास खींची ने प्रतिरोध किया।
- इसका वर्णन शिवदास गाढण ने अचलदास ‘खींची री वचनिका’ में किया।
दूसरा साका 1444 ई. में
- मांडू शासक सुल्तान महमूद खिलजी ने आक्रमण किया।
- गागरोन का शासक पल्हणसी खींची था
- वीरांगनाओं ने जौहर किया।
- महमूद खिलजी ने गागरोन का नाम मुस्तफाबाद रखा था।
Tuesday, 20 February 2018
मेवाड़ के राजवंश
गुहिलों का अभ्युदय
- अबुल फजल मेवाड़ के गुहिलों को ईरान के बादशाह नौ शेरखां आदिल की सन्तान होना मानते है।
- डी. आर. भण्डारकर मेवाड़ के गुहिलों को ब्राह्मण वंश से मानते है, क्योंकि बापा के लिए ‘विप्र’ शब्द आया है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा भी यह मानते है।
- मुहणौत नैणसी इन्हें आदिरूप में ब्राह्मण एवं जानकारी से क्षत्रिय मानते है।
- डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझाा, इन्हें ‘सूर्यवंशी’ मानते है।
विटामिन
- विटामिन पोषण के लिए महत्त्वपूर्ण तत्व हैं।
- शरीर को इनकी बहुत ही कम आवश्यकता होती है, फिर भी इनका शरीर पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
- इनका ऊर्जा स्रोत के रूप में कोई महत्त्व नहीं है किंतु शरीर के विभिन्न उपापचयी प्रक्रमों पर नियंत्रण करते हैं और शरीर की बीमारियों से रक्षा करते हैं। विटामिन की कमी से भी रोग होते हैं जिन्हें अपूर्णता रोग कहते हैं।
- विटामिन केवल भोजन से प्राप्त होते हैं, क्योंकि इनका संश्लेषण केवल पादप ही कर सकते हैं। हमारे शरीर की कोशिकाओं द्वारा इनका संश्लेषण नहीं हो सकता। इसकी पूर्ति के लिए विटामिनयुक्त भोजन से होती है।
- विटामिन D एवं विटामिन K का संश्लेषण मानव शरीर में होता है।
- विटामिन शब्द का प्रयोग सी फंक ने सन् 1911 ई. में किया।
- विलेयता के आधार पर विटामिनों को दो वर्गों में बांटा गया है-
- जल में घुलनशील विटामिन - B तथा C
- वसा में घुलनशील विटामिन – A, D, E, K
विटामिन
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कार्य
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मुख्य स्रोत
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कमी के प्रभाव
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विटामिन A (रेटिनॉल)
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वृद्धि, आंखों की निरोगता, त्वचा, श्लेष्मा झिल्ली की कोशिकाओं की क्रिया करता है।
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मछली के यकृत का तेल, फल, टमाटर, गाजर, मक्खन, अण्डे की जर्दी
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वृद्धि रुकना, रतौंधी, जीरोफ्थैल्मिया
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विटामिन B1 (थायमीन)
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वृद्धि, कार्बोहाइड्रेट का उपापचय
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मांस, दूध, सोयाबीन, मुर्गा, अंकुरित अनाज, अंडा
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बेरी-बेरी, वृद्धि रुकना, पेट की खराबी, पेशियों की सक्रियता
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विटामिन B2 (राइबोफ्लेविन)
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वृद्धि, त्वचा व मुख की निरोगता, आंखों की सक्रियता
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मांस, सोयाबीन, दूध, हरी सब्जी
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वृद्धि रुकना, जीभ पर छाले होना, असमय बुढ़ापा, प्रकाश न सह पाना
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विटामिन B3(पेन्टोथेनिक अम्ल)
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कोएंजाइम ए तथा एसीटाइलीन कोलाइल के संश्लेषण के लिए आवश्यक
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यीस्ट, मांस, जिगर, गुर्दा, अंडा, दूध
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पेशियों में लकवा, पैरों में जलन महसूस होना
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विटामिन B5 (निकोटिनैमाइड)
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वृद्धि, कार्बोहाइड्रेट का उपापचय, तंत्रिका तंत्र में सक्रियता के लिए
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मूंगफली का तेल, मांस, आलू, साबुत अनाज, टमाटर, सब्जी
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त्वचा पर फोड़ा-फुंसी, पाचन गड़बड़ी मानसिक रोग, (पेलाग्रा) का होना
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विटामिन B6 (पायरीडॉक्सीन)
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एमीनो अम्ल का उपापचय
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मांस, यकृत, अनाज आदि
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त्वचा रोग, शरीर का भार कम होना, एनीमिया
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विटामिन B7 (बायोटीन)
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कार्बोहाइड्रेट उपापचय, त्वचा व बालों की रक्षा
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मांस, दूध, अंडे, गिरीदार फल
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लकवा, शरीर में दर्द, वृद्धि की कमी, बालों का गिरना
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विटामिन B12 (साइनोकोबैलिन)
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रुधिराणु बनाना, न्यूक्लिक अम्ल का संश्लेषण, नाइट्रोजन का उपापचय
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दूध, अंडे, यकृत
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रुधिर की कमी होना, एनीमिया
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फोलिक अम्ल
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हरी सब्जी, सेम, यीस्ट, अंडा
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एनीमिया तथा पेचिश रोग
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विटामिन C (ऐस्कॉर्बिक अम्ल)
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वृद्धि, दांतों का विकास, मसूड़ों की निरोगता तथा घाव भरना
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नींबू, आंवला, संतरा, नारंगी, टमाटर, पत्तीदार तरकारी
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मसूड़े फूलना, स्कर्वी, अस्थियां कमजोर होना
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विटामिन D (कैल्सीफेरॉल)
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वृद्धि, अस्थियों तथा दांतों का निर्माण
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सूर्य का प्रकाश, दूध, अंडे, यकृत
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रिकेट्स (सूखा रोग), कमजोर दांत, दांतों का सड़ना
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विटामिन E (टैकोफेरॉल)
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जनन
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पत्ती वाली सब्जी, दूध, मक्खन, अंकुरित गेहूं, तेल
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जनन शक्ति का कम होना
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विटामिन K (फिलोक्विनोस)
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रुधिर के सामान्य थक्के जमना, यकृत की सामान्य क्रियाओं के लिए
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हरी सब्जियां, सोयाबीन का तेल, टमाटर
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रुधिर स्राव होना, ऐंठन आदि
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महत्त्वपूर्ण खनिज पदार्थ तथा उनके कार्य -
पोषण सम्बन्धी तथ्य -
- प्रोटीन की कमी से कैलारी कुपोषण हो जाता है। क्वाशियोरकॉर तथा मैरेस्मस ऐसे ही रोग हैं।
- क्वाशियोरकॉर रोग मां के दूध के स्थान पर कार्बोहाइड्रेट युक्त अन्य भोजन लेने से होता है। इसमें बच्चे का वजन कम हो जाता है, उसकी वृद्धि रुक जाती है और उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के देशों में लाखों बच्चे इस रोग में पीड़ित हैं।
- मैरेस्मस नामक रोग में बच्चों के हाथ-पैर पतले हो जाते हैं, पेशियां कमजोर हो जाती हैं और शारीरिक वृद्धि तथा वनज में कमी हो जाती है। यह रोग स्तनपान के स्थान पर अल्प पोषक आहार लेने के कारण होता है। इस रोग से पीड़ित बच्चों को प्रोटीन तथा कार्बोहाइड्रेट की उचित मात्रा युक्त भोजन दिया जाना चाहिए।
- लैथीरी रुग्णता (लैथाइरिज्म) नामक रोग जल में घुलनशील तंत्रि-आविष के कारण होता है। भारत में यह रोग अधिक खेसरी दाल खाने के कारण उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा बिहार के कुछ क्षेत्रों में होता है। इस रोग में निचले मेरुदंड पर चकते बन जाते हैं और टांगों का पक्षाघात हो जाता है।
- इन्सुलिन कार्बोहाइड्रेट का पाचन कर उसे शर्करा में परिवर्तित करने में सहायता करता है। इन्सुलिन के अभाव में यह शर्करा तंतुओं में न मिलकर रक्त और मूत्र में चली जाती है, फलतः मुधमेह नामक रोग हो जाता है।
Sunday, 18 February 2018
महाराणा प्रताप का राष्ट्रप्रेम और स्वामिभक्ति आज भी लोगों में प्रेरणा जागती है
महाराणा प्रताप (1572-97 ई.)
- इनका जन्म विक्रम संवत 1597 (9 मई 1540 ई.) को कुम्भलगढ़ दुर्ग (कटारगढ़) के बादल महल में हुआ।
- महाराणा प्रताप का जन्म वीर विनोद के अनुसार 15 मई 1539 ई. (मुहणोत नैनसी के अनुसार 4 मई 1540 ई.) को कुंभलगढ़ में हुआ था।
- पिताः उदयसिंह
- माताः जैवन्ता बाई (पाली नरेश अखैराज सोनगरा चौहान की पुत्री)
- प्रताप का बचपन का नामः कीका
- विवाह: 1557 ई. में अजब दे पंवार के साथ हुआ जिससे 16 मार्च 1559 ई. में अमरसिंह का जन्म हुआ।
- उदयसिंह की होली के दिन 28 फरवरी 1572 ई. को गोगुन्दा में मृत्यु हो गई। यहां स्थित महादेव बावड़ी पर 28 फरवरी 1572 ई. को मेवाड़ के सामंतों एवं प्रजा ने प्रतापसिंह का महाराणा के रूप में राज तिलक किया।
- उदयसिंह द्वारा नामित उत्तराधिकारी जगमाल को मेवाड़ के वरिष्ठ सामंतों ने अपदस्थ कर दिया।
- उदयसिंह ने अपनी रानी भटयाणी के प्रभाव में आकर प्रताप की जगह जगमाल को उत्तराधिकारी बना गया।
- सोनगरा अखैराज ने जगमाल को गद्दी से हटाकर प्रताप को गद्दी पर बैठाया, कृष्णदास ने प्रताप की कमर में राजकीय तलवार बांधी।
- 1570 ई. में अकबर का नागौर में दरबार लगा जिसमें मेवाड़ के अलावा अधिकतर राजपूतों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।
- अकबर ने महाराणा प्रताप के संबंध में 1572 ई. से 1576 ई. के बीच चार शिष्ट-मण्डल भेजे, परन्तु वे प्रताप को अधीन लाने में असफल रहे।
- अ. पहली बार दरबारी जलाल खां जिसको नवंबर 1572 ई. में महाराणा प्रताप के पास भेजा, जो आत्मसमर्पण करवाने में असफल रहा।
- ब. जून 1572 ई. में ही आमेर के राजकुमार मानसिंह को भेजा। दोनों की मुलाकात उदयसागर की पाल झील के पास हुई लेकिन वह भी राणा को अकबर की अधीनता स्वीकार करवाने में असफल रहा।
- स. सितम्बर-अक्टूबर 1573 ई. में राजा भगवन्तदास को भेजा लेकिन वे भी असफल रहे।
- द. दिसम्बर 1573 ई. में टोडरमल को भेजा लेकिन वह भी असफल रहा। अंत में अकबर ने युद्ध से महाराणा प्रताप को बंदी बनाने की योजना बनाई तथा मानसिंह को मुख्य सेनापति बनाकर भेजा।
- ये चारों शिष्टमंडल प्रताप को समझाने में असफल रहे तो अकबर ने प्रताप को युद्ध में बंदी बनाने की योजना बनाई।
- बंदी बनाने की योजना अजमेर में स्थित किले में बनाई गई जिसमें आज संग्रहालय स्थित है तथा अंग्रेजों के समय का शस्त्रागार होने के कारण इसे मैगजीन भी कहते हैं।
- अकबर ने मानसिंह को इस युद्ध का मुख्य सेनापति बनाया तथा मानसिंह का सहयोगी आसफ खान को नियुक्त किया गया।
- मानसिंह 3 अप्रैल 1576 ई. को शाही सेना लेकर अजमेर से रवाना हुआ। उसने पहला पड़ाव मांडलगढ़ में डाला, 2 माह तक वहीं पर रहा उसके बाद वह आगे नाथद्वारा से लगे हुए खमनौर के मोलेला नामक गांव के पास अपना पड़ाव डाला।
- महाराणा प्रताप ने गोगुंदा और खमनौर की पहाड़ियों के मध्य स्थित हल्दीघाटी नामक तंग घाटी में अपना पड़ाव डाला।
- हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ई. में हुआ। कर्नल टॉड ने इसे थार्मोपल्ली का युद्ध कहा है। इस युद्ध को इतिहासकार खमनौर व गोगुन्दा का युद्ध भी कहते है।
- राजपूतों ने मुगलों पर पहला आक्रमण इतना आक्रामक किया कि मुगल सैनिक चारों ओर जान बचाकर भागें। इस प्रथम चरण के युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एक मात्र मुस्लिम सरदार हकीम खां सूरी का नेतृत्व सफल रहा था।
- पहले मुगल सेना हार रही थी परन्तु मुगल सेना के आरक्षित सेना के नेता मिहत्तर खां ने अकबर की आने की झूठी अफवाह फैला दी जिससे मुगलों के सैनिकों में जोश आ गया।
- राजपूत भी पहले मोर्चें में सफल होने के बाद बनास नदी के किनारे वाले मैदान में जिसे ‘रक्तताल’ कहते हैं में आ जमें।
- इस युद्ध में राणा की ओर से पूणा व रामप्रसाद हाथी और मुगलों की ओर से गजमुक्ता व गजराज के मध्य युद्ध हुआ। रामप्रसाद हाथी के महावत के मारे जाने के कारण हाथी मुगलों के हाथ लग गया। इसका नाम अकबर ने पीरप्रसाद रखा।
- मानसिंह मरदाना नामक हाथी पर सवार था।
- मुगलों की शाही सेना ने प्रताप को चारों ओर से घेर लिया। बड़ी सादड़ी का झाला मन्ना सेना को चीरते हुए राणा के पास पहुंचा और महाराणा से निवेदन किया कि ‘आप राज चिह्न उतार कर मुझे दे दीजिए और आप इस समय युद्ध के मैदान से चले जाएं इसी में मेवाड़ की भलाई है।
- चेतक की घायल होने की स्थिति को देखकर राणा ने वैसा ही किया। राजचिह्न के बदलते ही सैकड़ों तलवार झाला मन्ना पर टूट पड़ी। झाला मन्ना इन प्रहारों का भरपूर सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
- महाराणा प्रताप का स्वामीभक्त घोड़ा चेतक बलीचा गांव में स्थित एक छोटा नाला पार करते हुए परलोक सिधार गया। इसी जगह ‘बलीचा गांव’ में चेतक की छतरी बनी हुई है।
- ‘ओ नीला घोड़ा रा असवार’ शब्द राणा ने सुनें। प्रताप ने सिर उठाकर देखा तो सामने उसके भाई शक्तिसिंह को पाया। शक्तिसिंह ने अपनी करनी पर लज्जित होकर बड़े भाई के चरण पकड़ कर क्षमा याचना की, महाराणा प्रताप ने उन्हें गले लगाया और क्षमा कर दिया। इसकी जानकारी ‘अमरकाव्य वंशावली ग्रंथ व राजप्रशस्ति’ से मिलती है। जिसकी रचना संस्कृत भाषा में रणछोड़ भट्ट नामक विद्वान ने की।
- फरवरी 1577 ई. में स्वयं अकबर और अक्टूबर 1577 ई. से लेकर नवम्बर 1579 ई. तक शाहबाज खान का तीन बार लगातार मेवाड़ अभियान करना अकबर का अपना उद्देश्य पूरा करने के प्रयास थे, वे भी असफल रहे।
- महाराणा प्रताप कोल्यारी गांव कमलनाथ पर्वत के निकट ‘आवरगढ़’ में अपनी अस्थायी राजधानी स्थापित करना एक विजेता का होना सिद्ध करना है।
- 1580 ई. में अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना को प्रताप के विरूद्ध युद्ध करने भेजा। अब्दुल रहीम के साथ उसका परिवार भी आया जिसे उसने शेरपुर में छोड़ा। अमरसिंह ने मौका पाकर शेरपुर पर आक्रमण कर अब्दुल रहीम खानखाना के परिवार को बंदी बना लिया। महाराणा इससे नाराज हुए और उन्होंने अमरसिंह को अब्दुल रहीम के परिवार को सम्मानपूर्वक वापस छोड़कर आने को कहा।
- मुगल सम्राट अकबर ने 5 दिसम्बर, 1584 ई. को आमेर के भारमल के छोटे पुत्र जगन्नाथ कछवाहा को प्रताप के विरुद्ध भेजा। वह भी सफलता नहीं पा सका अपितु उसकी मांडलगढ़ में मृत्यु हो गई।
- प्रताप ने 1585 ई. के लगभग मेवाड़ के पश्चिमी-दक्षिणी भाग जोकि छप्पन के नाम से प्रसिद्ध था, के लूणा चावण्डियां को पराजित कर चावंड को अपनी आपातकालीन राजधानी बनाया। चावंड 1585 ई. से अगले 28 वर्षों तक मेवाड़ की राजधानी रही। यहीं पर महाराणा प्रताप ने चामुंडा माता का मंदिर बनवाया।
- धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते हुए महाराणा प्रताप के चोट लगी, जिसके कारण 19 जनवरी, 1597 ई. को उनकी ‘चावंड’ में मृत्यु हो गई।
- चावंड से 11 मील दूर बांडोली गांव के निकट बहने वाले नाले के तट पर महाराणा का दाह संस्कार किया गया।
- खेजड़ बांध के किनारे 8 खंभों की छतरी आज भी हमें उस महान योद्धा की याद दिलाती है।
- प्रताप की मृत्यु का समाचार अकबर के कानों तक पहुंचा तो उसे भी बड़ा दुख हुआ। इस स्थिति का वर्णन अकबर के दरबार में उपस्थित दुरसा आढा ने इस प्रकार किया,
‘अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी गहलोत
राण जीती गयो दसण मूंद रसणा उसी,
नीसास मूक मरिया नयण तो मृत शाह प्रतापसी’
- इसका तात्पर्य था कि राणा प्रताप तेरी मृत्यु पर बादशाह ने दांत में जीभ दबाई और निःश्वास से आंसू टपकाए क्योंकि तूने अपने घोड़े को नहीं दगवाया और अपनी पगड़ी को किसी के सामने नहीं झुकाया वास्तव में तू सब तरह से जीत गया।
- कर्नल जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी को मेवाड की थर्मोपल्ली और दिवेर को ‘मेवाड़ का मैराथन’ कहा है।
Saturday, 10 February 2018
Thursday, 8 February 2018
राजस्थान उच्च न्यायालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रिक्त पदों पर सीधी भर्ती
राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर
- विज्ञापन सं.: रा.उ.न्या.जो./परीक्षा प्रकोष्ठ/अधीनस्थ न्यायालय/चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी/2018/65 दिनांकः 08/02/2018
- जिला न्यायालयों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (कार्यालय चपरासी/समतुल्य पद) के रिक्त पदों पर सीधी भर्ती-2017
- राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर द्वारा अधीनस्थ न्यायालय ( चालक एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) सेवा नियम 2017 के प्रावधानों के अन्तर्गत राजस्थान के जिला न्यायालयों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (कार्यालय चपरासी/ समतुल्य पद) के निम्न उल्लेखित रिक्त पदों हेतु नियमानुसार रुपये 12,400/- (फिक्सड) प्रतिमाह पारिश्रमिक पर परिवीक्षाधीन प्रशिक्षणार्थी की सीधी भर्ती हेतु निर्धारित ऑनलाइन प्रारूप में ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित किये जाते हैं।
रिक्त पद-
क्षेत्र
|
सामान्य
|
आरक्षित श्रेणी
|
कुल रिक्त पदों की संख्या
| क्षैतिजीय आरक्षित पद | ||
SC
अ.जा.
|
ST
अ.ज.जा.
|
OBC/MBC
अ.पि.व.
|
निःशक्तजन
| |||
गैर-अनुसूचित क्षेत्र
Non TSP Areas
|
1253
|
318
|
278
|
329
| 2178 |
52
|
अनुसूचित क्षेत्र
TSP Areas
|
75
|
03
|
53
| 131 |
02
| |
ऑनलाइन आवेदन पत्र प्रस्तुत करने की अंतिम तिथिः-
- आवेदन-पत्र दिनांक 12.02.2018 सोमवार को प्रातः 11 बजे से अन्तिम दिनांक 13.03.2018 मंगलवाल को रात्रि 11ः59 बजे तक भरे जा सकेंगे, इसके उपरांत लिंक निष्क्रिय हो जायेगा। आवेदकों को सलाह दी जाती है कि ऑनलाइन की अन्तिम दिनांक व समय की प्रतीक्षा किए बिना, निर्धारित समय सीमा के अन्दर, यथाशीघ्र ऑनलाइन आवेदन करे। इच्छुक अभ्यर्थी विस्तृत जानकारी हेतु राजस्थान उच्च न्यायालय की वेबसाइट http://www.hcraj.nic.in पर विस्तृत विज्ञप्ति एवं अधिक जानकारी देखे।
- रजिस्ट्रार (परीक्षा)
- विस्तृत जानकारी
- online
मांडना चित्रण
- मरवन मंडे मांडना निरखे चतुर सुजान
- राजस्थानी लोक अलंकरण का सबसे विकसित और प्रचलित रूप है मांडना। मांडना का अर्थ है चित्रित करना अथवा बनाना।
- वे समस्त आकृतियां जो दीवार अथवा जमीन पर खड़िया, गेरू, हिरमच, पेवड़ी, काजल एवं अन्य देशी रंगों के माध्यम से बनाई जाती हैं, मांडना कहलाती है। ये आकृतियां हाथ की अगुलियों अथवा कूंची से बनाई जाती है। रेखाएं, रंग-टीकियां (टपकियां) और गांठे इसके चित्रण के प्रमुख माध्यम होते हैं।
- होली, दीवाली, दशहरा अथवा अन्य त्योहारों पर जब समस्त घरों की लीपा-पोती और सजावट की जाती है तब यहां की महिलाएं देहरी, आंगन, दीवार या आलों में मांडना की सुन्दर आकृतियां बनाती हैं। ये मांडने विविध रंगों और अलंकृत रूपों में शोभित होते हैं।
- राजस्थानी लोक मानस की सहज झलक हमें इन मांडनों में देखने को मिलती है।
- घरों की सुन्दरता में चार चांद लगाने वाले ये मांडने शुभ-शकुन के प्रतीक भी माने जाते हैं। इनमें गृहस्थ जीवन के सुख और समृद्धि की मंगलकारी भावना अन्तनिर्हित होती है।
- मांडना बनाने की कला यहां की कुमारियों को अपने घर की चतुर एंव अधेड़ महिलाओं से विरासत में मिलती रहती है। इसके लिए कन्याओं या नारियों को किसी विद्यालय में शिक्षा पाने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि घर में ही इनका चित्रण सीखकर वे अपने-अपने ढंग से इनको चित्रित करती है।
- राजस्थानी मांडना महाराष्ट्र की ‘रंगोली’, बंगाल के अल्पना, उत्तर प्रदेश के ‘चौक पूरना’ और बिहार के ‘एपने’ आदि से केवल आंचलिक रूप से ही अलग है। साधन और श्रम की दृष्टि से ये कलाएं लगभग एक सी है। लोकरंजन और भावाभिव्यक्ति का भी इनमें कोई विशेष अन्तर नहीं हे। मांडना की अलंकृत परिकल्पनाओं का प्रचलन यहां प्राचीन काल से ही रहा है। जन जीवन में कलात्मक अभिरुचि उत्पन्न होने के साथ-साथ् ही मांडना अलंकरण की प्रथा भी चल निकली।
- राजस्थान के मांडनों में चौक, चौपड़, संझया, श्रवण कुमार, नागों का जोड़ा, डमरू, जलेबी, फीणी, चंग, मेहन्दी, केल, बहू पसारो, बेल, दसेरो, साथिया (स्वस्तिक), पगल्या, शकरपारा, सूरज, केरी, पान, कुण्ड, बीजणी (पंखे), पंच-नारेल, चंवरछत्र, दीपक, हटड़ी, रथ, बैलगाड़ी, मोर व अन्य पशु पक्षी आदि प्रमुख है।
- मांडने घर की सुन्दरता में वृद्धि करते हैं। वे उमंग, उत्साह, उल्लास का सृजन भी करते हैं और वातावरण को रस से भर देते हैं।
- मांडनों की प्राचीनता स्वयंसिद्ध है। वेदों, पुराणों में हवनों और यज्ञों में वेदी और आसपास की भूमि पर हल्दी, कुमकुम आदि से विभिन्न आकृतियां बनाई जाती थी।
गवरी लोक नृत्य
- गवरी राजस्थान के उदयपुर, डूंगरपुर, सिरोही और बांसवाड़ा क्षेत्र में भीलों का प्रचलित मनोरंजक लोकनृत्य है।
- भील समुदाय के धार्मिक जीवन में गवरी को विशेष स्थान प्राप्त है।
- वर्षा ऋतु में भाद्रपद माह से चालीस दिन तक भील समुदाय गवरी नृत्य उत्सव बड़े उल्लास से मनाते हैं। गांव या शहर के चौराहों अथवा खुले आंगन में यह लोकनृत्य आयोजित किया जाता है। यह एक संस्कारपूर्ण पावन लोकनृत्य है। इसमें धार्मिक और सांसारिक कार्यों का मिला-जुला रूप दिखाई देता है।
- यह राजस्थान का सबसे प्राचीन लोक नाट्य है जिसे लोक नाट्यों का मेरुनाट्य कहा जाता है।
- इस लोक नृत्य के साथ लोक प्रचलित शिव तथा भस्मासुर की कथा जुड़ी हुई है।
- एक बार भस्मासुर नामक एक असुर ने तपस्या करके भगवान शिव से भस्मी का कड़ा प्राप्त कर लिया। बाद में मदान्ध होकर उस कड़े से जब उसने शिव को ही भस्म करने का प्रयत्न किया तो विष्णु जी ने मोहनी का रूप धारण करके भस्मासुर को मारा।
- भगवान शिव भीलों के प्रमुख देवता माने जाते हैं अतः भीलों ने गवरी के रूप में उनके जीवन की सर्वाधिक प्रभावशाली घटना को अपनाया और उनके प्रति श्रद्धा एवं भक्ति का परिचय देने के लिए इस नृत्य का आयोजन आरम्भ किया।
- गवरी का प्रदर्शन केवल भील लोग ही करते हैं। इस नृत्य के साथ भीलों का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है और वे ही इसके एक मात्र उपासक, आयोजक एवं अभिनेता कहे जाते हैं। गवरी नृत्य उत्सव भीलों की एकता, दक्षता एवं ग्रामीण जीवन और आदिम जातीय जीवन के सम्बन्धों का सूचक है। यह एक रोचक तथ्य है कि इस उत्सव में सिर्फ पुरुष ही भाग लेते हैं। औरत का अभिनय भी वे स्वयं ही करते हैं।
- यह उत्सव देवी गौरी के सम्मान में मनाया जाता है, परन्तु स्त्रियों को इस धार्मिक कार्य में भाग लेने योग्य नहीं समझा जाता। भील परिवार का प्रत्येक सदस्य इसमें भाग लेना अपना धार्मिक कर्त्तव्य समझता है। इस नृत्य का प्रदर्शन प्रतिदिन एक ही स्थान पर नहीं होता वरन् विभिन्न गावों की यात्रा करते हुए इसका प्रदर्शन किया जाता है।
- गवरी अभिनेता पूरे सवा महीने तक एक ही पोशाक धारण किये रहते है।
- इस नृत्य में मुख्यतः चार प्रकार के पात्रों की अवधारणा होती है। देव कालका तथा शिव एवं पार्वती के साथ ही अन्य पात्र इस प्रकार हैः
- मानव पात्रः- बुढ़िया, राई, कूट-कड़िया, कंजर-कंजरी, मीणा, नट, बणिया, जोगी, बनजारा-बनजारिन तथा देवर-भोजाई इत्यादि।
- दानव पात्रः- भंवरा, खडलियाभूत, हठिया, मियावाड़।
- पशु पात्रः- सुर (सुअर), रीछड़ी (मादा रीछ), नार (शेर) इत्यादि।
- झामट्या लोक भाषा में कविता बोलता है तथा खटकड़िया उसे दोहराता है।
- गांव के बीच किसी खुले स्थान - जैसे खेत, खलिहान, चौराहा या टेकरी में देवी का स्थान बनाया जाता है। जय शंकर महादेव, जय गौरी माई आदि नारों के साथ इस स्थान पर त्रिशूल रूप में शिव व अन्य देवी-देवताओं की स्थापना करके, धूप देकर भोपा द्वारा अपने शरीर में देवी की आत्मा को आमंत्रित किया जाता है।
- मृदंग तथा जालर के संगीत में सभी मग्न हो जाते है।
- लोक-जीवन के सांस्कृतिक उन्नयन में लोकनृत्य गवरी का उल्लेखनीय योगदान रहा है। सांस्कृतिक भेदभाव तथा ऊंच-नीच जैसी कोई भावना उन्होंने पनपने नहीं दी है।
- गवरी की यह सांस्कृतिक निधि हमारी रूढ़ियों, परम्पराओं, रीतियों, विश्वासों, मान्यताओं तथा सम्भ्रान्त चेतनाओं की एक ऐसी सम्पत्ति है जिसमें हमारा लोक-जीवन समृद्ध बना हुआ है।
- गवरी किसी वर्ग या जाति विशेष की धरोहर नहीं है। उसका क्षेत्र सीमित होते हुए भी वह समग्र लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। आपसी मेलजोल, एकता और सत्य की विजय तथा कला एवं संस्कृति का आदान-प्रदान ही इस नृत्य के मूल में निहित रहा है।
Tuesday, 6 February 2018
रेलवे में 27019 असिस्टेंट लोको पायलट और टेक्निशियन पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित
- रेलवे भर्ती बोर्ड ने लोको पायलट और तकनीशियन के रिक्त पदों पर भर्ती हेतु आवेदन आमंत्रित किये हैं। योग्य उम्मीदवार आवेदन के प्रारूप के अंतर्गत 5 मार्च, 2018 तक आवेदन करें।
- ऑनलाइन आवेदन के प्रारंभ होने की तिथि - 03 फरवरी, 2018
- आवेदन की अंतिम तिथि - 5 मार्च, 2018
- स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में चालान जमा करने की तिथि - 5 मार्च, 2018
- पोस्ट ऑफिस में चालान जमा करने की अंतिम तिथि- 3 मार्च 2018
पदों का विवरण:-
- असिस्टेंट लोको पायलट के पदों की संख्या - 17849
- तकनीशियन के पद - 9170
वेतनमानः-
- पे-स्केल: 19900 प्रतिमाह + अन्य अलाउंस
शैक्षणिक योग्यताएं-
- लोको पायलट - 10वीं कक्षा पास साथ ही आई.टी.आई. कोर्स पूरा होना या डिप्लोमा/डिग्री (इंजीनियरिंग) में होना आवश्यक है।
- तकनीशियन - 10वीं कक्षा पास साथ ही आई.टी.आई. कोर्स पूरा होना या फिजिक्स एवं केमिस्ट्री विषय के साथ 12वीं पास होना या डिप्लोमा/डिग्री (इंजीनियरिंग) में होना आवश्यक है।
आयु सीमा:-
- उम्मीदवार की आयु 18 से 30 वर्ष के बीच होनी चाहिए। आयु की गणना 1 जनवरी 2018 के आधार पर किया जायेगा।
- अधिक पढ़ने के लिए विज्ञप्ति पर क्लिक करें - नोटिफिकेशन
राजस्थान के लोक वाद्य
- वे वाद्य यंत्र जो लोक गीत एवं लोक नृत्यों के साथ प्रयुक्त होते हैं लोकवाद्य कहलाते हैं।
- राजस्थान में कई श्रेणी के लोक वाद्य है जिनमें प्रमुख श्रेणी हैं - तत्, घन, सुषिर और अवनद्ध वाद्य।
अवनद्ध (ताल) वाद्य (चमड़े से मढ़े हुए) -
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तत् वाद्य -
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घनवाद्य -
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सुषिर वाद्य -
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1. जिसके एक ही ओर खाल मढ़ी हो, जैसे - खंजरी, चंग, डफ, डैंरू, धौंसा, तासा, कुंड़ी
2. जिनका घेरा लकड़ी या धातु का हो तथा चमड़ा दोनों ओर मढ़ा हो, जैसे - मांदल, ढोल, डमरू, पखावज
3. जिनका ऊपरी भाग खाल से ढका हो तथा कोटरीनुमा नीचे का भाग बंद रहता हो, जैसे- नोबत, नगाड़ा, माठ, दमामा, माटा।
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जन्तर,
इकतारा, रावणहत्था, सारंगी,
चिकारा, भपंग, कमठ, कामायचा,
टोटो,
चौतारा, रवाज,
तन्दुरा,
निशान।
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मंजीरा,
झांझ,
करताल,
खड़ताल,
झालर,
चिमटा
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बांसुरी,
अलगोजा, पूंगी, शहनाई,
सतारा,
मश्क, नड़,
मोरचंग,
बांकिया,
भूंगल,
नागफनी।
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सुषिर वाद्य-
- वे वाद्ययंत्र जो फूंक से बजाये जाते हैं। इस श्रेणी के प्रमुख वाद्ययंत्र निम्नलिखित है-
अलगोजा -
- यह बांसुरी के समान बांस की नली से बना वाद्य होता है। इसमें नली के ऊपरी मुख को छीलकर उस पर लकड़ी का गट्टा चिपका दिया जाता है जिससे आवाज निकलती है।
- वादक एक साथ दो अलगोजे एक साथ मुंह में रखकर बजाता है। अलगोजा वाद्य को आदिवासी भील व कालबेलिया जाति का प्रिय वाद्य है।
नड़ -
- कगौर वृक्ष की 1 मीटर लम्बी लकड़ी से बनाया जाता है।
- माता या भैरव के राजस्थानी भोपे तथा लंगा जाति द्वारा भी बजाया जाता है।
- करणा भील प्रसिद्ध नड़ वाद्यकार रहा।
सतारा -
- यह अलगोजा, बांसुरी और शहनाई का समन्वित रूप है। इसमें अलगोजे के समान दो नलियों तथा बांसुरी के समान छः छेद होते हैं।
- इससे किसी भी इच्छित छेद को बन्द करके आवश्यकतानुसार सप्तक में परिवर्तन किया जा सकता है।
- सतारा जैसलमेर व बाड़मेर क्षेत्र में गडरिया, मेघवाल और मुस्लिम जाति के गायक बजाते हैं।
पूंगी -
- घीया या तुम्बे से बना होता है।
- तुम्बी का पतला भाग लगभग डेढ़ बालित लम्बा होता है।
- नीचे का हिस्सा गोलाकार होता है।
- सपेरा जाति, कालबेलिया व जोगी बजाते हैं।
मोरचंग -
- (आरएएस मुख्य परीक्षा 2010 में)
- लोहे से बने इस वाद्य को होठों के बीच में रखकर बजाया जाता है।
- यह एक गोलाकार हैण्डिल से दो छोटी और लम्बी छड़ें निकली होती हैं, इनके बीच में पतले लोहे की लम्बी रॉड रहती है जिसके मुंह पर थोड़ा-सा घुमाव दे दिया जाता है।
- लंगा जाति द्वारा।
सींगी -
- हिरण, बारहसिंगा, भैंसे के सींगों से बना होता है।
- जोगियों द्वारा बजाया जाता है।
नागफणी -
- पीतल की सर्पाकार नली जिसके पिछले हिस्से में छेद होता है।
- साधु-संन्यासियों द्वारा मन्दिरों में
तत् वाद्य -
- वे वाद्य यंत्र जो तार से बने होते हैं। तारों के द्वारा स्वर उत्पत्ति वाले वाद्ययंत्र।
इकतारा -
- छोटे से गोल तुम्बे में बांस की डंडी फंसाकर बनाते हैं।
- तुम्बे का छोटा भाग बकरे के चमड़े से मढ़ दिया जाता है।
- तुम्बे पर बांस की दो खूंटियां लगी होती हैं और ऊपर-नीचे दो तार बंधे होते हैं।
- इसे नाथ, कालबेलियों और साधु-संन्यासियों द्वारा बजाया जाता है।
चिकारा -
- कैर की लकड़ी से बना। इनका एक सिरा प्याले के आकार का होता है। जिसके तीन तार होते हैं। गज की सहायता से बजाया जाता है।
- जोगियों, मेवों द्वारा अलवर में, गरासियों द्वारा उदयपुर, पाली, सिरोही में बजाया जाता है।
जन्तर -
- वीणा की आकृति से मिलते इस वाद्य में दो तुम्बे होते हैं।
- इसकी डांड बांस की होती है। जिस पर मगर की खाल से बने 22 पर्दे मोम से चिपकाये जाते हैं। परदों के ऊपर पांच या छः तार लगे होते हैं।
- इस वाद्य यंत्र का प्रयोग बगड़ावतों की कथा गाते समय गूजरों के भोपे गल में लटकाकर करते हैं।
रावण हत्था-
- इस वाद्य यंत्र को आधे कटे नारियल की कटोरी पर खाल मढ़ कर बनाया जाता है।
- इसकी डांड बांस की होती है, जिसमें खूंटिया लगा दी जाती है और नौ तार बांध दिये जाते हैं।
- रावण हत्थे की गज धनुष के समान होती है तथा इस पर घोड़े के बाल व घुघरु बंधे होते हैं।
- इसका प्रयोग पाबूजी, डूंगजी- जंवार जी के भोपे कथाएं गाते समय करते हैं।
- डूंगजी, पाबूजी के भोपे फड़ बांचते समय रावण हत्थे का प्रयोग करते हैं।
सारंगी -
- तत् वाद्यों में श्रेष्ठ लोकवाद्य।
- सारंगी सागवान, कैर या रोहिड़े की लकड़ी से बनाई जाती है। इसमें कुल 27 तार होते हैं तथा ऊपर की तांते बकरे की आंतों से बनाई जाती हैं।
- इसका वादन घोड़े की पूंछ के बालों से निर्मित गज से किया जाता है।
- सारंगी जैसलमेर और बाड़मेर के लंगा जाति के गायकों तथा मारवाड़ के जोगियों द्वारा गोपीचंद, भर्तृहरि, निहालदे आदि के ख्याल गाते समय प्रयुक्त की जाती है।
भपंग -
- डमरु की आकृति वाला तुम्बे से बना।
- भपंग अलवर व मेव क्षेत्र के जोगी प्रमुखतया बजाते हैं।
- जहूर खां मेवाती प्रसिद्ध भपंग वादक।
कामायचा -
- यह राजस्थान का प्रसिद्ध तत् लोकवाद्य है जो सारंगी के समान वाद्य है जिसकी तबली चमड़े से मढ़ी गोल व लगभग डेढ़ फुट चौड़ी होती है।
- इसको बजाने की गज में 27 तार लगे होते हैं। तार बकरे की तांत के बने होते हैं।
- इसे जैसलमेर, बाड़मेर क्षेत्र में मांगणियार जाति के लोग बजाते हैं।
- नाथ पंथ के साधु भर्तृहरि व गोपीचन्द के गीत इस पर गाते हैं।
रवाज़ -
- यह सारंगी के समान वाद्य है जिसे नखों से बजाया जाता है।
- इसमें तारों की संख्या 12 होती है।
- मेवाड़ के राव व भाट जाति के लोग बजाते हैं।
अवनद्ध वाद्य -
- ताल से बजने वाले वाद्य
चंग -
- यह होली पर बजाया जाने वाला प्रमुख ताल वाद्य है। इसे ढप भी कहा जाता है।
- च्ंग का गोला छोटा लकड़ी से बना हुआ होता है और इसके एक तरफ बकरे की खाल मढ़ दी जाती है।
- इसे बजाने वाला कन्धे पर रखकर जाता है।
डफ -
- होली के अवसर पर
- लोहे या लकड़ी के बड़े चक्र पर खाल मढ़कर। चंग से बड़ा होता है।
माठा -
- पाबूजी के पवाड़ों के वाचन के समय भोपे बजाते हैं।
खंजरी -
- आम की लकड़ी का बना वाद्ययंत्र, जिसे एक ओर खाल से मढ़ा जाता है।
- राजस्थान में कामड़, भील, नाथ और कालबेलिया जाति के लोग खंजरी बजाते हैं।
डैरूं -
- आम की लकड़ी का बना वाद्ययंत्र, जिसके दोनों तरफ चमड़ा मढ़ दिया जाता है।
- गोगाजी के पुजारी इसे बजाते हैं
- इसके बीच के हिस्से को दाहिने हाथ स पकड़ते हैं और रस्सी को खींचने पर आवाज उत्पन्न होती है।
मांदल -
- यह मृदंग के समान होता है तथा मिट्टी से बनाया जाता है।
- इसका एक मुंह छोटा व दूसरा बड़ा होता है। इसका मढ़ी हुई खाल पर जौ का आटा चिपकाकर बनाया जाता है।
- इसे शिव-गौरी का वाद्ययंत्र माना जाता है।
घन वाद्य
- वे वाद्य यंत्र जो धातु के बने होते हैं।
मंजीरा -
- यह पीतल और कांसे की मिश्रित धातु का गोलाकार वाद्य होता है। इनके मध्य भाग में छेद कर दो मंजीरों को रस्सी से बांध दिया जाता है।
- तेरहताली नृत्य में मंजीरे प्रमुख वाद्य यंत्र है।
खड़ताल -
- यह दो लकड़ी के टुकड़ों के बीच में पीतल की छोटी-छोटी गोल तश्तरियां लगी रहती है जोकि लकड़ी के टुकड़ों को आपस में टकराने से बजती है।
झांझ -
- यह मंजीरे का विशाल रूप है, इसका व्यास लगभग एक फुट होता है।
- यह शेखावाटी क्षेत्र के कच्छी घोड़ी तृत्य में ताशें के साथ बजाया जाता है।
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